Monday, June 4, 2012

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको


                 अदम गोंडवी


आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेखबर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज़ में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"

"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा

होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -

"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"
 
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा

इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"

बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल"
 
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए ! 

Saturday, June 2, 2012

रामू चाचा, रामू चाचा



रामू चाचा, रामू चाचा 
तुम्हारे आंगन में 
वो बरगद का बड़ा 
पेड़ हुआ करता था,
जिस पर हम सभी 
बच्चे झूला झूलते थे
जिस पर पूरे गांव की 
चिड़िया घोंसला बनाया करती थी
लगता है वह बूढ़ा 
बरगद का पेड़ 
समाजवाद की तरह
 सूख गया है
अब तो गांव में 
अलग-अलग 
जातियों के पेड़ हैं। 
जो केवल अपनों को ही 
छाया देते हैं। 
कुछ पेड़ धर्म के भी हैं
जो रोज प्रवचन करते हैं
जिनकी अजानों से 
एक ही छाया निकलती है
रामू चाचा, रामू चाचा
एक दिन यह पेड़ भी 
बरगद की तरह सूख जाएगा
अच्छा है कि बच्चे
अब इन पेड़ों के नीचे नहीं खेलते। 


Friday, June 1, 2012

क्योंकि मेरे पास अपने सपने नहीं हैं।



मुङो अपना चेहरा याद नहीं 
पर यकीनी तौर पर 
मैं वो नहीं रहा 
जो कभी था। 
अब मेरे पास 
अपने सपने नहीं रहे 
अब मेरा दायरा बंध गया है। 
अब मेरी बीवी और बच्चें हैं
अब मुङो बच्चों की खतीर
काम करना होगा 
अब मुङो उनकी नजर में 
अच्छा बनना होगा 
मैं यह नहीं जानता 
कि मेरा क्या होगा 
क्योंकि मेरे पास 
अपने सपने नहीं हैं। 
अब हर माह 
मेरी बीवी, मेरी तन्खवाह 
का खर्च पूछती है। 
बचत क्यों नही करते 
यह उलहाना देती है। 
मेरी बूढ़ी मां 
मेरे बड़े भाई के घर पर 
रहती है
वहां मेरी भाभी को 
दूसरा बच्चा होने वाला है। 
मेरे बूढ़े पिताजी 
अपने बनाएं घर में 
अब अकेले रहते हैं 
और मैं यहां 
उन्हें भूल गया हूं। 
अभी मेरे बेटे ने 
बोलना शुरू नहीं किया है। 
अभी मेरे पास इस दिल्ली शहर में 
कोई घर नहीं है। 
हर माह किराए में 
वेतन का बड़ा हिस्सा 
कुर्बान हो जाता है। 
मेरी बीवी मुझसे 
अपना घर खरीदने को रोज कहती है। 
अपनी नौकरी में 
उसने भी कुछ पैसे 
बचाएं हैं। 
पर मै उससे कह नहीं पाता 
कि यूं तो 
एक दिन हम भी 
बूढ़े हो जाएंगे
और तुम भी 
मेरी बूढ़ी मां की तरह 
अपने बेटे के घर 
बुला ली जाओगी
और तुम्हारे सपनों के घर में 

Thursday, May 31, 2012

इस घुटन के पार..


एक आदिम चीख सी दबी है
 जैसे कहीं अंदर 
घुटन का हटे
 जो रूह से पत्थर
 तो शायद मिल जाए
 उसको कोई स्वर। 
 इन दिनों जेहन में 
 कौंध रहा 
 एक ही सवाल बार-बार
 कहीं, कुछ तो होगा 
 इस घुटन के पार। 
जहां न हो, संस्कारों का कोई बोझ 
जहां न हो,रिश्तों की झूठी डोर 
चल वहीं, बस जाएं अब 
 जहां मुक्त होकर,कर सकें इजहार 
जिंदगी शायद मिले वहीं , कहीं 
 चल चलें ,इस घुटन के पार 
जहां सांस लेने से पहले 
 पूछना न पड़े, कोई सवाल 
 जहां आन- जाने का कोई वक्त न हो मुकर्रर 
 चल वहीं चले मेरे दोस्त 
 जहां लंच करने का वक्त तय न हो 
जहां भागती हुई 
घड़ियों की सुई का कोई भय न हो 
 जहां दफ्तर की 
झूठी अदावत का कोई झंझट नहीं हो 
 जहां प्रेमिका के रूठ
 जाने का कोई वक्त तय नहीं हो 
 जहां पंछी समय देख कर 
 गाना न गाते हों 
 जहां झूठी कसमों का साया न 
हो जहां हर पांच साल बाद 
वाला चुनाव न हो 
 जहां जिंदगी 
किसी थाने के 
 पंचनामें में लिखी 
 केस का कोई नंबर न हो 
 चल चलें उस रास्ते पर 
 जहां एक दूसरे से पीछे 
 रह जाने का मतलब न हो 
 चल चलें उस ओर
 हर पल भागते
 लोगों के समन्दर के पार
 चल चलें इस घुटन के पार
 चल चलें इस घुटन के पार ।

Sunday, June 5, 2011

हे महान मनमोहन तुम क्योँ जिन्दा हो ?

मैं योगगुरु स्वामी रामदेव के साथ नहीं हूं। मैं कांग्रेस और यूपीए-टू की ताकतवर सरकार के साथ भी नहीं हूं। मैं आम आदमी हूं जिसे रामदेव को जबरन दिल्ली से भगाया जाना अच्छा नहीं लगता। मैं वो आम आदमी हूं जो सत्ता के दमन चक्र का हर बार शिकार होता है।

चार जून की रात जो कुछ भी हुआ उसके बाद मैं खुद को ठगा महसूस करता हूं। शायद मेर भी मन में इस सत्ता के प्रति एक नफरत जन्म लेने लगी है। मैं इस बात को समझता हूं कि अनशन करना बुरा नहीं है। मैं इस बात को भी समझता हूं कि अनशन करने वालों पर जुल्म करना अच्छा नहीं है।

कई दशक पहले आजादी के आंदोलन के दौरान भी सत्तासीन फिरंगियों ने हमपर जुल्म किए थे। मैं रामदेव के अनशन को आजादी के आंदोलन के बराबर का दर्जा नहीं देता। पर जो सलूक उनके साथ किया गया वो निश्वित रूप से सही नहीं थी। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
मुझे लगता है कि सत्ता का अपना स्वरुप होता है। और मनमोहन सिंह की सरकार निहायत फिरंगी तौर तरिकों का इस्तेमाल करती है। बीते दिनों जब भी सरकार के मंत्रियों की करतूते सामने आई हो। या फिर अन्ना हजार का अनशन हो। हर बार सरकार और उसके मंत्रियों का जो रवय्या दिखा। उसे देख कर लगा ही नहीं कि वो सभी बड़े लोग इसी गरीब देश के निवासी हैं ।
ऐसा लगता है कि सत्ता के नशे में चूर लोगों को केवल वही बात सुनाई पड़ती है। जो वह सुनना चाहते हैं। नहीं तो रामदेव के साथ जो सलूक किया गया वह कतई बर्दाश्त के काबिल नहीं था। मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर इस घटना के बाद भी मनमोहन सिंह सामने आकर यह कहें कि हम एक गठबंधन की सरकार में है और मुझे इस बार में ज्यादा नहीं पता। मेरे देश के हे महान नायक मनमोहन तुम क्योँ जिन्दा हो ?

Wednesday, April 14, 2010

पुराने पेड़ नहीं बचे तो नहीं बचेंगे देशी पंछी

मेरठ में पुराने दररख्तों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है, जिससे कई देसी प्रजातियों को खतरा उत्पन्न हो गया है।





कठफोड़वा की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। इस चिडिय़ा को खाने और घर बनाने के लिए कम से कम 50 से 70 साल पुराने और मोटे पेड़ चाहिए। जिसके तने में वह 60 से 70 सेमी गहरे गोल छेद बना सके। मेरठ में एेसे दरख्तों की संख्या बहुत कम हो गई है। नतीजतन कठफोड़वा के सामने रहने-खाने का संकट खड़ा होता जा रहा है। एनसीआर समेत आसपास के इलाकों का हाल भी बहुत जुदा नहीं है। काटे जा रहे पुराने दरख्तों की वजह से कठफोड़वा की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। कुछ यही हाल लाल, हरे,भूरे और सफेद धब्बों वाली बारवेट प्रजातियों का है।
कभी पूरे एनसीआर के इलाकों में हजारों की तादाद में पाए जाने वाली इन चिडिय़ों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। सुंदर चोच वाली हार्नबिल चिडिय़ों की आबादी भी इसी वजह घट रही है। दरअसल रेड, ग्रीन और ब्राउन हेडेड बारवेट समेत ग्रे और अन्य हार्नबिल को भी पुराने दरख्तों में बने बड़े खोल चाहिए, जो धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। पुराने दरख्तों के काटे जाने का सीधा असर इन प्रजातियों की प्रजनन प्रक्रिया पर पड़ रहा है। दरअसल पेड़ खत्म हो जाने से ब्रीडिंग धीमी हो गई है। वन्य जीव वैज्ञानिक रजत भार्गव के मुताबिक, वेस्ट यूपी में हालात तेजी से खराब होते जा रहे हैं। उनकी मानें तो मेरठ समेत एनसीआर इलाके में दरख्तों की संख्या कम होती जा रही है। उन्होंने साफ किया अगर पुराने पेड़ नहीं बचाए गए तो इन पंछियों को बचाना बेहद मुश्किल होगा।

देसी चिडिय़ों का ब्रीडिंग मौसम
मार्च - अप्रैल - पाराकीटस और हार्नबिल
जून-जुलाई - मैगपाई रॉबीन, वुडपैकर और बारवेट

इन पंछियों के प्रजनन पर पड़ रहा असर
पैराकीट
हॉर्नबिल
वुडपैकर
बारवेट

पंछियों को चाहिए यह पेड़
जामुन, सेमल, नीम, पीपल, गुलर, पीलखन

पुराने पेड़ क्यों चाहिए
पुराने पेड़ इन पंछियों को खाना उपल्बध कराते हैं। साथ ही उसमें बनाए जाने वाले खोटरों में रहने की सुविधा भी मिलती है। खास बात यह है कि ब्रिडिंग के लिए जरूरी है। साथ ही पंछियों के छोटे बच्चों के लिए यह खोटर खाना और सुरक्षा भी प्रदान करते हैं। वाटरलविंग बर्डस और कठफोड़वा जैसी मजबूत चोंच वाली चिडिय़ां इन फटासों में मौजूद कीड़ों को खूब मजे से खाती हैं। तनों में करीब 60 से 70 सेमी गहरे गोल छिद्र बनाती हैं। जबकी बाद में हार्नबिल जैसे पंछी छह माह में एक मीटर तक गहरा बना देते हैं।

पॉपुलर, यूकेलिप्टस और एलेस्टोनिया
एनसीआर समेत वेस्ट यूपी के शहरों में पॉपुलर, यूकेलिप्टस और एलेस्टोनिया के पेड़ों की संख्या बेहद ज्यादा है। पॉपुलर और यूकेलिप्टस के तने में फटास नहीं होती। चिकने तनों में कीड़े भी नहीं होते और तना खासा सख्त होता है। चिडिय़ों के इनके तनों में भोजन नहीं मिलता इसलिए इसमें खोटर नहीं बनाती, वहीं एलेस्टोनियों को डेवील ट्री या पार्किंग ट्री भी कहा जाता है। इस पेड़ पर पंछी घोसला लगाना तो दूर बैठना तक पसंद नहीं करते।

लाखों चिडिय़ां हो जाएंगी बेघर
कभी देहरादून जाने वाली सड़क के किनारे पुराने दरख्त थे। जहां चिडिय़ों की बड़ी आबादी थी। वक्त के साथ सारे पेड़ विकास की भंेट चढ़ गए। चिडिय़ों की आबादी भी इलाके से गायब हो गई। अब एक बार फिर यही कहानी दोहराई जाने वाली है। गंग नगर के किनारे लगाए गए पेड़ों को काटा जाना तय हो चुका है। एक्सप्रेस-वे को आठ लेन से बनाने के लिए करीब चालीस हजार पेड़ काटे जाने हैं। जिसमें बड़ी संख्या पुराने दरख्तों की हैं, जिससे एक बार फिर चिडिय़ों की बड़ी आबादी को खतरा पैदा हो गया है। बताते चलें कि इस पूरे रास्ते पर पेड़ों की कटान शुरू भी हो गई है।

Sunday, April 4, 2010

कभी जंग ए आजादी देखी थी मैंने, आज हमवतनों ने आग लगा दिया



- मैं बूढ़ा नीम का पेड़ हूं

मॉल रोड पर करीब दो सौ साल पुराने पेड़ में किसी ने आग लगा दी। शनिवार दोपहर बाद पेड़ गिर चुका था। वेस्ट यूपी मंे नीम के बूढ़े दरख्तों में जानबूझकर आग लगा दी जाती है।

मेरठ में कभी जंग-ए-आजादी देखी थी मैंने। मॉल रोड पर फिरंगियों का राज आज भी याद है मुझे। आजादी की पहली लड़ाई के दौरान वीर सपूतों ने मेरे सामने ही अंग्रेजों को खदेड़ा था। ब्रितानी राज के खात्मे के बाद हिन्दुस्तानी हुकूमत के परवान चढऩे का भी मैं गवाह रहा था। मगर मेरे हम वतनों ने ही शनिवार देर रात को मेरी खोखली हो चुकी जड़ों में आग लगा दी।
मैं नीम का पेड़ हूं। मेरी उम्र तुम्हारी तीन पुश्तों से भी ज्यादा है। बीते डेढ़ सौ सालों से मैं मॉल रोड के इतिहास के हर पल का गवाह रहा हूं। बीसी जोशी ऑफिसर्स इन्कलेव के रास्ते पर मेरी घनी छांव राहगीरों को तपती दुपहरी में सकून पहुंचाती थी। मेरठ कैंट में रहने वालों को जन्म से ही शुद्ध ऑक्सीजन दे रहा हूं। ना मालूम कितने पक्षियों को आसरा दिया मैंने। मगर ढलती उम्र में दीमक का शिकार होने के बाद मुझे ही आग लगा दी।
एक दिन पहले तक तोपखाने और लालकुर्ति समेत आस पास के इलाके से महिलाएं मेरी पूजा करने आती थी। मेरी छांव में कई देवताओं की मूर्तियों को विश्राम दिया। पर जब आग लगी तो फायर विभाग भी खानपूर्ति करने पहुंचा। शनिवार दोपहर तपती दुपहरी में मैं धीमे-धीमे जलता रहा। मगर कोई मुझे बचाने नहंी पहुंचा। आग की वजह से दोपहर में भरभराकर गिर गया। शाम तक भी धुंआ मेरे तनो को बुरी तरह जला चुका था।
बीते बीस घंटों से मॉल रोड पर मेरे कई हम उम्र साथी मुझे जलता देखने को मजबूर है। कुछ माह पहले मेरे ही सामने मॉल रोड पर करीब पांच मीटर दूर मुझसे भी दो गुणी उम्र के पेड़ को काट डाला गया था। तब मैं खामोश था। आज सब खामोश हैं।

शम्सुद्दीन का गुस्सा

शनिवार दोपहर को 76 साल के शमसुद्दीन जलते पेड़ को देखने पहुंचे थे। कभी शाहपीर गेट पर रहने वाले और फिलहाल तोपखाना निवासी शमसुद्दीन बेहद गुस्से में थे। दरअसल उनकी बचपन की यादें इस पेड़ से जुड़ी थी। उन्होंने बताया कि डोगरा लेन, सीडीओ ऑफिस के पीछे और साकेत स्थित नीम के पेड़ की तरह इसमें भी अंधविश्वास की वजह से आग लगाइ जा चुकी है। उन्होंने बताया कि अंधविश्वासी मानते हैं किसी पुराने नीम के पेड़ मंे आग लगा देने से संतानप्राप्ती होती है। इसी अंधविश्वास की वजह से करीब दो सौ साल पुराने नीम के पेड़ को जला दिया गया।