बना लो, जितनी बडी कम्यूनिटी बनानी है बना लो! घर में चाहे एकदूसरे को पहचानते हो या नहीं? पर बाहर अपनी एकजुटता का जितना ढिंढोरा पीटना है पीट लो! इंटरनेट पर ब्लोग बनालो! मीडिया में आपसी भाईचारे के नाम पे जितनी शोबाज़ी करनी है कर लो! पर कभी अपने घर मे झाँक कर नहीं देखना की तुम्हारे अपने 'बिहार' में कितने नीच और पतित समाज की फसल उग-बढ़ रही है ! पर तुम्हे इससे क्या? कहीं झड़प हुई चल दिये अपने बिहारीपन का परिचय देने! इंटरनेट पर बैठे और शुरु हो गयें भाईचारे का राग अलापने! पर कभी इस पर भी विचार किया है, कभी इस संबंध में भी कोई कदम उठाने की कोशिश की है की, जहां जिस मिट्टी में पले बढ़े हो, वहीं ऐसे कु-कृत्य को अंजाम दिया जा रहा है, जिसे सुनकर किसी भी भले मानुष की आंखे शर्म-सार हो जायें!
सुपौल, त्रिवेणीगंज की छेदनी देवी अब अपनी चहार दिवारी से पैर बाहर नहीं निकालती! उसके लिये घर का वह बंद कोना ही उसकी सारी दुनिया है! क्यों? क्योंकि, अब वह मुँह दिखाने के लायक नहीं है! पुरा इलाका उसके नंगे उघड़े बदन को देख चुका है! अस्मत तार तार हो चुकी है!अब कैसे वह तन पर कपड़ों के चंद टुकड़े लपेटे बाहर निकलेगी? इस समाज ने तो उसे पूरी तरह "पारदर्शी" बना दिया है! कसूर? कसूर यह है की वह 'डायन' है ऐसा समाज के चंद ठेकेदार कहते हैं, उसने उस इलाके की एक बच्ची पर टोटका कर के मार डाला है! और उसे इसकी सजा तो मिलनी ही चाहिये! क्यों, है की नहीं ? भाई ऐसे समय पर ही तो एकत्व की भावना नज़र आती है ! फिर क्या, उस औरत के तन पर ढँकी उस चादर को बात की बात में निकाल फेंका गया ! अब निर्वस्त्र कर के उसे खड़े-खड़े देखते तो भला अच्छा लगता ? तो उसे पुरे मुहल्ले मे निर्वस्त्र घुमाया गया, उसे पीटा गया और इससे भी तमाशे मे आंनद नहीं आया तो, आंख फोड़ देने की धमकी देकर मैला पिलाया गया! खेल खतम, पैसा हज़म !!
हां!एक ब्रेकिंग न्यूज तो बताई ही नहीं ! इतना बड़ा तमाशा हुआ पर कोई OB-VAN पास नहीं फटकी! अजी वही OB-VAN जो चैनल वाले ले कर चलते है, Live Telecast करने के लिये! ताकी आप घर बैठे ही हो रही घटना का आनंद ले सके! ओह, सचमुच अफसोस रहा, नहीं ?? सीधा प्रसारण हो जाता तो मज़ा ही कुछ और होता!! नहीं ???
पर ज़रा रुकिये तो सही जनाब , अभी तो यह शुरुआत है! पटना के पहाड़ी मुहल्ले में एक बच्ची बीमार पड गयी! बस क्या था, आतताइयों ने इसके लिये कमला को ज़िम्मेदार बता दिया! उसे घर से खींचकर इतना पीटा गया की बेचारी वह तथाकथित "डायन" अधमरी हो गयी! कुछ और लोगों को यश मिला।
क्या कहा, कि इनके घर वाले कुछ नहीं करते? करते हैं साहब, ज्यादातर मामलों मे घर वाले ही सब कुछ करते हैं- समाज के ठेकेदारों से मिल के! हां, मगर कमला जैसे कुछ एक घरवाले आवाज़ उठाने की हिम्मत करते हैं तो उनकी भी वो पिटाई होती है कि ऊपर बैठे उनके पुरखे तक ज़बान बन्द रखने की क़सम खा लेते हैं !
अब कहां तक बताएँ आपको! अब तो इस पंचायती राज में किसी की भी खैरियत नहीं साहब और ख़ास तौर पर अगर वो महिला है तो पहले इल्ज़ाम तय और तुरन्त फ़ैसला और उसपर तुर्रा ये कि अगर वो महिला दलित है तो सज़ाओं में कुछ इज़ाफ़ा हो जाता है। जैसे जाजापुर (गोह, औरंगाबाद) में वार्ड पार्षद शोभा देवी को डायन बताकर मारा-पीटा गया! और तो और कुछ दिनों पहले पूर्णिया शहर के बीचोंबीच हज़ारों लोगों ने पुलिस की मौज़ूदगी में सावित्री देवी को जान से ही मार डाला!अब लो इस औरत का भी कसूर पूछ रहे हो?कसूर बता बता कर तो थक गया अब कितनी बार बताउँ।
आखिर यह कैसी विकृत मानसिकता और अपराध को प्रशासन का संरक्षण है, जो किसी की बीमारी खातिर बस "मां बहन और बेटी" को दोषी ठहराती है और उसकी बाक़ायदा सजायाफ्तगी भी करती है ? मैं तुम से सिर्फ इस लिये कह रहा हूं की अगर हम बिहार के होकर भी कोई क़दम नहीं उठाते तो दुसरों से क्या अपेक्षा की जा सकती है?। हमारी यह मूक दर्शक भूमिका हमें हर स्तर पर 'अपराधी' ठहरायेगी ! राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा को खत्म किया, और दयानंद जी ने विधवा पूनर्विवाह की शुरुआत उस माहौल में की जब धार्मिक रूढ़िवादिता की नींव को हिलाना तक संभव नहीं था ! तो क्या हम आज इस इक्कीसवीं शताब्दी में इस "डायन प्रथा" को उखाड नहीं फेंक सकते हैं ? या फिर भू-मंडलीकरण के युग में भी हम यूँ हीं मध्ययुगीन कुरीतियों को मूक-बधिर होकर नज़र- अंदाज़ करते रहेंगे ?
सरकार ने डायन प्रथा विरोधी विधेयक बनाकर अपना पल्ला झाड़ लिया है! आज भी यह विधेयक कोरे पन्नों मे क़ैद हो के रह गया है! आज जरुरत है इसे सख़्ती से लागू करवाने की!
उठो ! जागो !! वरना आज किसी की मां-बहन को नंगा करके मुहल्ले मे घुमा रहे हैं, गुप्तांगों को सलाखों से दाग रहे हैं, मल-मूत्र पिला रहे हैं, कल शायद हमारे-तुम्हारे घर की भी बारी आ जाये! तब चुल्लू भर पानी लेके डूब मरना! सिर्फ खाना खा कर दफ़्तर और घर आकर टी.वी. देखकर ज़िन्दगी मत ख़त्म करो ! मनुष्य हो तो मनुष्यता की रक्षा के लिये भी अपना योगदान दो! तभी 'स्त्री' का वास्तविक आदर होगा वो स्त्री जो किसी की माँ,बहन और बेटी है तभी उसका सच्चा सम्मान होगा। तभी एक सुंदर समाज की रचना होगी। वरना याद रखो यह "डायन" की आड़ में किया जा रहा बर्बर और पैशाचिक कार्य कल किसी भी घर का ग्रहण बन सकता है, तब देखना कि तुम तब भी मूक दर्शक न बने रह जाओ! तब देखना कि तुम तब भी सोते न रह जाओ!!
और कभी नींद खुले और यह चीख़... तुम्हारे कानों मे पड़े, तो डरना मत, बल्कि ठंडे दिमाग से सोचना कि आखिर कौन है, असली "डायन" ???...!!!
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