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Saturday, June 2, 2012

रामू चाचा, रामू चाचा



रामू चाचा, रामू चाचा 
तुम्हारे आंगन में 
वो बरगद का बड़ा 
पेड़ हुआ करता था,
जिस पर हम सभी 
बच्चे झूला झूलते थे
जिस पर पूरे गांव की 
चिड़िया घोंसला बनाया करती थी
लगता है वह बूढ़ा 
बरगद का पेड़ 
समाजवाद की तरह
 सूख गया है
अब तो गांव में 
अलग-अलग 
जातियों के पेड़ हैं। 
जो केवल अपनों को ही 
छाया देते हैं। 
कुछ पेड़ धर्म के भी हैं
जो रोज प्रवचन करते हैं
जिनकी अजानों से 
एक ही छाया निकलती है
रामू चाचा, रामू चाचा
एक दिन यह पेड़ भी 
बरगद की तरह सूख जाएगा
अच्छा है कि बच्चे
अब इन पेड़ों के नीचे नहीं खेलते। 


Friday, June 1, 2012

क्योंकि मेरे पास अपने सपने नहीं हैं।



मुङो अपना चेहरा याद नहीं 
पर यकीनी तौर पर 
मैं वो नहीं रहा 
जो कभी था। 
अब मेरे पास 
अपने सपने नहीं रहे 
अब मेरा दायरा बंध गया है। 
अब मेरी बीवी और बच्चें हैं
अब मुङो बच्चों की खतीर
काम करना होगा 
अब मुङो उनकी नजर में 
अच्छा बनना होगा 
मैं यह नहीं जानता 
कि मेरा क्या होगा 
क्योंकि मेरे पास 
अपने सपने नहीं हैं। 
अब हर माह 
मेरी बीवी, मेरी तन्खवाह 
का खर्च पूछती है। 
बचत क्यों नही करते 
यह उलहाना देती है। 
मेरी बूढ़ी मां 
मेरे बड़े भाई के घर पर 
रहती है
वहां मेरी भाभी को 
दूसरा बच्चा होने वाला है। 
मेरे बूढ़े पिताजी 
अपने बनाएं घर में 
अब अकेले रहते हैं 
और मैं यहां 
उन्हें भूल गया हूं। 
अभी मेरे बेटे ने 
बोलना शुरू नहीं किया है। 
अभी मेरे पास इस दिल्ली शहर में 
कोई घर नहीं है। 
हर माह किराए में 
वेतन का बड़ा हिस्सा 
कुर्बान हो जाता है। 
मेरी बीवी मुझसे 
अपना घर खरीदने को रोज कहती है। 
अपनी नौकरी में 
उसने भी कुछ पैसे 
बचाएं हैं। 
पर मै उससे कह नहीं पाता 
कि यूं तो 
एक दिन हम भी 
बूढ़े हो जाएंगे
और तुम भी 
मेरी बूढ़ी मां की तरह 
अपने बेटे के घर 
बुला ली जाओगी
और तुम्हारे सपनों के घर में 

Thursday, May 31, 2012

इस घुटन के पार..


एक आदिम चीख सी दबी है
 जैसे कहीं अंदर 
घुटन का हटे
 जो रूह से पत्थर
 तो शायद मिल जाए
 उसको कोई स्वर। 
 इन दिनों जेहन में 
 कौंध रहा 
 एक ही सवाल बार-बार
 कहीं, कुछ तो होगा 
 इस घुटन के पार। 
जहां न हो, संस्कारों का कोई बोझ 
जहां न हो,रिश्तों की झूठी डोर 
चल वहीं, बस जाएं अब 
 जहां मुक्त होकर,कर सकें इजहार 
जिंदगी शायद मिले वहीं , कहीं 
 चल चलें ,इस घुटन के पार 
जहां सांस लेने से पहले 
 पूछना न पड़े, कोई सवाल 
 जहां आन- जाने का कोई वक्त न हो मुकर्रर 
 चल वहीं चले मेरे दोस्त 
 जहां लंच करने का वक्त तय न हो 
जहां भागती हुई 
घड़ियों की सुई का कोई भय न हो 
 जहां दफ्तर की 
झूठी अदावत का कोई झंझट नहीं हो 
 जहां प्रेमिका के रूठ
 जाने का कोई वक्त तय नहीं हो 
 जहां पंछी समय देख कर 
 गाना न गाते हों 
 जहां झूठी कसमों का साया न 
हो जहां हर पांच साल बाद 
वाला चुनाव न हो 
 जहां जिंदगी 
किसी थाने के 
 पंचनामें में लिखी 
 केस का कोई नंबर न हो 
 चल चलें उस रास्ते पर 
 जहां एक दूसरे से पीछे 
 रह जाने का मतलब न हो 
 चल चलें उस ओर
 हर पल भागते
 लोगों के समन्दर के पार
 चल चलें इस घुटन के पार
 चल चलें इस घुटन के पार ।

Sunday, June 5, 2011

हे महान मनमोहन तुम क्योँ जिन्दा हो ?

मैं योगगुरु स्वामी रामदेव के साथ नहीं हूं। मैं कांग्रेस और यूपीए-टू की ताकतवर सरकार के साथ भी नहीं हूं। मैं आम आदमी हूं जिसे रामदेव को जबरन दिल्ली से भगाया जाना अच्छा नहीं लगता। मैं वो आम आदमी हूं जो सत्ता के दमन चक्र का हर बार शिकार होता है।

चार जून की रात जो कुछ भी हुआ उसके बाद मैं खुद को ठगा महसूस करता हूं। शायद मेर भी मन में इस सत्ता के प्रति एक नफरत जन्म लेने लगी है। मैं इस बात को समझता हूं कि अनशन करना बुरा नहीं है। मैं इस बात को भी समझता हूं कि अनशन करने वालों पर जुल्म करना अच्छा नहीं है।

कई दशक पहले आजादी के आंदोलन के दौरान भी सत्तासीन फिरंगियों ने हमपर जुल्म किए थे। मैं रामदेव के अनशन को आजादी के आंदोलन के बराबर का दर्जा नहीं देता। पर जो सलूक उनके साथ किया गया वो निश्वित रूप से सही नहीं थी। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
मुझे लगता है कि सत्ता का अपना स्वरुप होता है। और मनमोहन सिंह की सरकार निहायत फिरंगी तौर तरिकों का इस्तेमाल करती है। बीते दिनों जब भी सरकार के मंत्रियों की करतूते सामने आई हो। या फिर अन्ना हजार का अनशन हो। हर बार सरकार और उसके मंत्रियों का जो रवय्या दिखा। उसे देख कर लगा ही नहीं कि वो सभी बड़े लोग इसी गरीब देश के निवासी हैं ।
ऐसा लगता है कि सत्ता के नशे में चूर लोगों को केवल वही बात सुनाई पड़ती है। जो वह सुनना चाहते हैं। नहीं तो रामदेव के साथ जो सलूक किया गया वह कतई बर्दाश्त के काबिल नहीं था। मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर इस घटना के बाद भी मनमोहन सिंह सामने आकर यह कहें कि हम एक गठबंधन की सरकार में है और मुझे इस बार में ज्यादा नहीं पता। मेरे देश के हे महान नायक मनमोहन तुम क्योँ जिन्दा हो ?

Wednesday, April 14, 2010

पुराने पेड़ नहीं बचे तो नहीं बचेंगे देशी पंछी

मेरठ में पुराने दररख्तों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है, जिससे कई देसी प्रजातियों को खतरा उत्पन्न हो गया है।





कठफोड़वा की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। इस चिडिय़ा को खाने और घर बनाने के लिए कम से कम 50 से 70 साल पुराने और मोटे पेड़ चाहिए। जिसके तने में वह 60 से 70 सेमी गहरे गोल छेद बना सके। मेरठ में एेसे दरख्तों की संख्या बहुत कम हो गई है। नतीजतन कठफोड़वा के सामने रहने-खाने का संकट खड़ा होता जा रहा है। एनसीआर समेत आसपास के इलाकों का हाल भी बहुत जुदा नहीं है। काटे जा रहे पुराने दरख्तों की वजह से कठफोड़वा की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। कुछ यही हाल लाल, हरे,भूरे और सफेद धब्बों वाली बारवेट प्रजातियों का है।
कभी पूरे एनसीआर के इलाकों में हजारों की तादाद में पाए जाने वाली इन चिडिय़ों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। सुंदर चोच वाली हार्नबिल चिडिय़ों की आबादी भी इसी वजह घट रही है। दरअसल रेड, ग्रीन और ब्राउन हेडेड बारवेट समेत ग्रे और अन्य हार्नबिल को भी पुराने दरख्तों में बने बड़े खोल चाहिए, जो धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। पुराने दरख्तों के काटे जाने का सीधा असर इन प्रजातियों की प्रजनन प्रक्रिया पर पड़ रहा है। दरअसल पेड़ खत्म हो जाने से ब्रीडिंग धीमी हो गई है। वन्य जीव वैज्ञानिक रजत भार्गव के मुताबिक, वेस्ट यूपी में हालात तेजी से खराब होते जा रहे हैं। उनकी मानें तो मेरठ समेत एनसीआर इलाके में दरख्तों की संख्या कम होती जा रही है। उन्होंने साफ किया अगर पुराने पेड़ नहीं बचाए गए तो इन पंछियों को बचाना बेहद मुश्किल होगा।

देसी चिडिय़ों का ब्रीडिंग मौसम
मार्च - अप्रैल - पाराकीटस और हार्नबिल
जून-जुलाई - मैगपाई रॉबीन, वुडपैकर और बारवेट

इन पंछियों के प्रजनन पर पड़ रहा असर
पैराकीट
हॉर्नबिल
वुडपैकर
बारवेट

पंछियों को चाहिए यह पेड़
जामुन, सेमल, नीम, पीपल, गुलर, पीलखन

पुराने पेड़ क्यों चाहिए
पुराने पेड़ इन पंछियों को खाना उपल्बध कराते हैं। साथ ही उसमें बनाए जाने वाले खोटरों में रहने की सुविधा भी मिलती है। खास बात यह है कि ब्रिडिंग के लिए जरूरी है। साथ ही पंछियों के छोटे बच्चों के लिए यह खोटर खाना और सुरक्षा भी प्रदान करते हैं। वाटरलविंग बर्डस और कठफोड़वा जैसी मजबूत चोंच वाली चिडिय़ां इन फटासों में मौजूद कीड़ों को खूब मजे से खाती हैं। तनों में करीब 60 से 70 सेमी गहरे गोल छिद्र बनाती हैं। जबकी बाद में हार्नबिल जैसे पंछी छह माह में एक मीटर तक गहरा बना देते हैं।

पॉपुलर, यूकेलिप्टस और एलेस्टोनिया
एनसीआर समेत वेस्ट यूपी के शहरों में पॉपुलर, यूकेलिप्टस और एलेस्टोनिया के पेड़ों की संख्या बेहद ज्यादा है। पॉपुलर और यूकेलिप्टस के तने में फटास नहीं होती। चिकने तनों में कीड़े भी नहीं होते और तना खासा सख्त होता है। चिडिय़ों के इनके तनों में भोजन नहीं मिलता इसलिए इसमें खोटर नहीं बनाती, वहीं एलेस्टोनियों को डेवील ट्री या पार्किंग ट्री भी कहा जाता है। इस पेड़ पर पंछी घोसला लगाना तो दूर बैठना तक पसंद नहीं करते।

लाखों चिडिय़ां हो जाएंगी बेघर
कभी देहरादून जाने वाली सड़क के किनारे पुराने दरख्त थे। जहां चिडिय़ों की बड़ी आबादी थी। वक्त के साथ सारे पेड़ विकास की भंेट चढ़ गए। चिडिय़ों की आबादी भी इलाके से गायब हो गई। अब एक बार फिर यही कहानी दोहराई जाने वाली है। गंग नगर के किनारे लगाए गए पेड़ों को काटा जाना तय हो चुका है। एक्सप्रेस-वे को आठ लेन से बनाने के लिए करीब चालीस हजार पेड़ काटे जाने हैं। जिसमें बड़ी संख्या पुराने दरख्तों की हैं, जिससे एक बार फिर चिडिय़ों की बड़ी आबादी को खतरा पैदा हो गया है। बताते चलें कि इस पूरे रास्ते पर पेड़ों की कटान शुरू भी हो गई है।

Sunday, April 4, 2010

कभी जंग ए आजादी देखी थी मैंने, आज हमवतनों ने आग लगा दिया



- मैं बूढ़ा नीम का पेड़ हूं

मॉल रोड पर करीब दो सौ साल पुराने पेड़ में किसी ने आग लगा दी। शनिवार दोपहर बाद पेड़ गिर चुका था। वेस्ट यूपी मंे नीम के बूढ़े दरख्तों में जानबूझकर आग लगा दी जाती है।

मेरठ में कभी जंग-ए-आजादी देखी थी मैंने। मॉल रोड पर फिरंगियों का राज आज भी याद है मुझे। आजादी की पहली लड़ाई के दौरान वीर सपूतों ने मेरे सामने ही अंग्रेजों को खदेड़ा था। ब्रितानी राज के खात्मे के बाद हिन्दुस्तानी हुकूमत के परवान चढऩे का भी मैं गवाह रहा था। मगर मेरे हम वतनों ने ही शनिवार देर रात को मेरी खोखली हो चुकी जड़ों में आग लगा दी।
मैं नीम का पेड़ हूं। मेरी उम्र तुम्हारी तीन पुश्तों से भी ज्यादा है। बीते डेढ़ सौ सालों से मैं मॉल रोड के इतिहास के हर पल का गवाह रहा हूं। बीसी जोशी ऑफिसर्स इन्कलेव के रास्ते पर मेरी घनी छांव राहगीरों को तपती दुपहरी में सकून पहुंचाती थी। मेरठ कैंट में रहने वालों को जन्म से ही शुद्ध ऑक्सीजन दे रहा हूं। ना मालूम कितने पक्षियों को आसरा दिया मैंने। मगर ढलती उम्र में दीमक का शिकार होने के बाद मुझे ही आग लगा दी।
एक दिन पहले तक तोपखाने और लालकुर्ति समेत आस पास के इलाके से महिलाएं मेरी पूजा करने आती थी। मेरी छांव में कई देवताओं की मूर्तियों को विश्राम दिया। पर जब आग लगी तो फायर विभाग भी खानपूर्ति करने पहुंचा। शनिवार दोपहर तपती दुपहरी में मैं धीमे-धीमे जलता रहा। मगर कोई मुझे बचाने नहंी पहुंचा। आग की वजह से दोपहर में भरभराकर गिर गया। शाम तक भी धुंआ मेरे तनो को बुरी तरह जला चुका था।
बीते बीस घंटों से मॉल रोड पर मेरे कई हम उम्र साथी मुझे जलता देखने को मजबूर है। कुछ माह पहले मेरे ही सामने मॉल रोड पर करीब पांच मीटर दूर मुझसे भी दो गुणी उम्र के पेड़ को काट डाला गया था। तब मैं खामोश था। आज सब खामोश हैं।

शम्सुद्दीन का गुस्सा

शनिवार दोपहर को 76 साल के शमसुद्दीन जलते पेड़ को देखने पहुंचे थे। कभी शाहपीर गेट पर रहने वाले और फिलहाल तोपखाना निवासी शमसुद्दीन बेहद गुस्से में थे। दरअसल उनकी बचपन की यादें इस पेड़ से जुड़ी थी। उन्होंने बताया कि डोगरा लेन, सीडीओ ऑफिस के पीछे और साकेत स्थित नीम के पेड़ की तरह इसमें भी अंधविश्वास की वजह से आग लगाइ जा चुकी है। उन्होंने बताया कि अंधविश्वासी मानते हैं किसी पुराने नीम के पेड़ मंे आग लगा देने से संतानप्राप्ती होती है। इसी अंधविश्वास की वजह से करीब दो सौ साल पुराने नीम के पेड़ को जला दिया गया।

Wednesday, January 27, 2010

मैंने समझा पारिश्रमिक किसी कवि का नाम है

- डॉ कुंवर बेचैन

बात सन 19५८ की है। चंदौसी के आर आर इंटर कॉलेज में कवि सम्मेलन था। काका हाथरसी और नीरज के साथ पहली बार मंच पर पढऩे का मौका मिला था। मैं तब इंटर में था। कवि सम्मेलन समाप्त होने के बाद संयोजक सुरंेद्र मोहन मिश्र ने पूछा पारिश्रमिक मिला या नहीं। मुझे लगा पारिश्रमिक किसी कवि का नाम है सो मैंने कहा नहीं। तब वह रिक्शे से मुझे पिं्रसिपल के घर ले गए। नीचे ही आवाज देकर चिल्लाए। प्रिसिंपल साहब। अंदर से किसी महिला की आवाज आई - वो तो अभी कॉलेज में ही हैं। हम लोग उसी रिक्शे से वापस कॉलेंज पहुंचे। पिं्रसिपल साहब को देखेत ही बोले। इसे इसका पारिश्रमिक तो दे दो । मुझे पांच रुपये दिए गए। तब मुझे पता चला पारिश्रमिक का मतलब पैसा होता है। मंच पर कविता पढऩे की एेसी शुरूआत हिंदी के मशहूर कवि डॉ कुंवर बैचेन की है। आज उन्हें मंच पर कविता पढ़ते पढ़ते 5१ साल हो गए। इतना सम्मान, यश और सफलता केवल चुनिंदा लोगों को मिल पाती है। बावजूद इसके वह आज भी रचनाकार के सहज होने की वकालत करते हैं। उनकी मानें तो मंच और कविता के लिहाज से फिहलाल संक्रमण काल जारी है। जिसके बीतते ही मंचीय कविता और शायरी का सुनहरा दौर लौट आएगा।
-
कवि परिचय

डॉ कुंवर बैचेन
हिन्दी के वरिष्ठ कवि, रचनाकार
मंच पर पांच दशक से सक्रिय, 19 देशो की यात्राएं
मंच पर पहला पाठन- 19५5 में नौंवी कक्षा में स्कूल में , 19५८ में कवि सम्मेलन में
पंसद-ए-जायका- उड़द की दाल/ रोटी

कविता -

सांस का हर सुमन है वतन के लिए
जिंदगी ही हवन है वतन के लिए
कह गईं फांसियों में फंसी गर्दनें
यह हमारा नमन है वतन के लिए
--

Monday, January 25, 2010

बात बशीर बद्र की --

तो राहत को ढूंढता फिरेगा बशीर बद्र

आज के गालिब या नए जामाने के मीर 'बशीर बद्र' से बातचीत शुरू करते वक्त हमने शेरो-शायरी या उर्दू लिट्रेचर से बजाए एक अलग सवाल पूछा। अगर बशीर बद्र एक बार फिर 17 साल के हो जाएं, तो क्या करेगें ? एक पल गंवाए बगैर उन्होंने कहा बद्र, राहत को ढूंढता फिरेगा। इतना बोलना था कि पीछे पीले पैराहन में बैठी राहत बद्र हंस पड़ी। शोख मुस्कुराहटों के उस दौर के बीच बशीर ने राहत को देखा। माहौल में शायरी घुल चुकी थी। मेरठ में होटल का वह कमरा शायरना हो चुका था। हमने दोबारा पूछा अगर राहत नहीं मिलतीं तो क्या बशीर मेरठ छोड़कर भोपाल चले जाते ? उन्होंने कहा कि जहां राहत होती वही पहुंच जाते। सवाल का अंदाज बदला तो उन्होंने कहा कि सारी दुनिया दे दीजिए तो भी उसे भोपाल ले आउंगा।
प्यार से भटकते सवाल अब भाषा तक पहुंचने लगे थे। बशीर बोले, शायरी की जुबान दिल की जुबान होती है। जज्बात शायरी है। जिंदगी शायरी है। उन्होंने कहा कि उर्दू और हिंदी का सवाल नहीं। यह तो महज लिखने का तरीका है। जो नीरज हिंदी में लिखते हैं । और जो बशीर उर्दू में रचते हैँ। वहीं शायरी है। वहीं मुक्कमल कविता है। नए जमाने के शायरों के बारे में उन्होंने साफगोई से कहा कि शायरी के लिए उर्दू आनी चाहिए। शायरी के लिए हिंदी की जानकारी चाहिए। शायरी वह है इल्म है जिसके लिए जिंदगी आनी चाहिए।
बात निकली तो बड़े शायर ने माना कि उनकी जितनी किताबें उर्दू में बिकती हैं उससे पांच गुणा किताब हिंदी में बिकती है। तय है शायरी किसी भाषा या किसी महजब की गुलाम नहीं। मौके पर उन्होंने अरबी और फारसी में कई शब्दों के न होने की दिक्कतों और उनके बहुत हद तक किताबी और आम-आवाम से दूर होने का हवाला भी दिया। करीब पौने घंटे के बाद माहौल घुल चुका था। उन्होंने माना कि सरहद के उस पार के राजनेता बेवकूफ है जो अपने लोगों को गलत तौर से बरगला रहे हैं। उन्होंने बताया की राजनीति काटना जानती है। जबकि शायरी दिलों को जोड़ती है।
सरहद पार लाहौर में रहने वाले दोस्त की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि चाहें दोनोंं मुल्क एक दूसरे के खिलाफ हो जाएं। वह दोस्त के लिए हमेशा दुआएं करेंगे। इस बीच उन्होंने पाकिस्तानी में छपी उनकी किताब की चर्चा छेड़ दी। उन्होंने कहा कि वहां किसी प्रकाशक ने कुलयार बशीर बद्र किताब छापी है। जिसे हिंंदी में तीन अगल अलग पुस्तक फूलों की छतरीयां, सात जमीनें एक सितारा और मोहब्बत खुशबू हैं नाम से प्रकाशित किया जा रहा है।
तमाम बातों के बीच ना जाने कहां से शादी की बात छिड़ गई। बशीर गंभीर हो गए। गौर से देखा। चश्मा उतार कर टेबल पर रख दिया। बोले...मेरे छोटे दोस्त मेरे पास तीन कार है। जल्द ही चौथी कार खरीद रहा हूं। जिसे राहत को दे दूंगा। उसके बाद कभी कार नहीं खरीदूगां। दरअसल इस्लाम में चार शादियां करने की इजाजत है। उसके बाद नहीं। इसलिए चार कार। बातों ही बातों में मेरठ में दंगे के दौरान शास्त्रीनगर के डी-१२0 के जलाए जाने और उसके बात उनके जेहन में आई। बशीर बोल रहे थे कि - वे (प्रशासन और आम लोग, उनके प्रेमी सहयोगी) पैसे देने की बात करते थे। मैंने मना कर दिया। कहा कि दो चार मुशायरे पढ़ लूंगा। इससे भी अच्छा घर बन जाएगा । -
इजाजत लेने से एेन पहले हमने उनसे खुराक और लज्जत की बात जानने की कोशिश की। तो नए जमाने के सबसे मशहूर शायर का कहना था, गोश्त छोड़कर सब पसंद है। उम्र के इस मुकाम पर उन्होंने बाकी बचे अरमान को उन्होंने बेमानी बताया हालांकि राहत की ओर देखकर बोले- भाई, बीबी डराती बहुत है। होटल के उस शायरान माहौल से उठने से पहले हम राहत से मुखातिब हुए। हमने पूछा कि आप लंबे समय से साथ है। कहीं न कहीं बशीर बद्र की इंस्पीरेशन हैं। आप क्या सोचती है। बशीर साहब के बारे में। खिलकर मुस्कुराने से पहले वह अचानक गंभीर हो गई। फिर हंसी तो देर तक हंसती रहीं। बोली, बशीर बिलकुल नहीं बदले। जो फर्क आया है उम्र की वजह से आया है। इस उम्र में कुछ याददाश्त कमजोर सी होनी लगी है। बस और बाकी सब वैसे ही है। बशीर साहब ने एक बार इश्क की चर्चा छेड़ दी। तब तक खाना आ चुका था। मजा देखीए काले लिबास में लिपटा बैरा दो थालियां लाया था। बशीर ने बीबी की ओर देखा और दोनों एक साथ ही बोले। एक ही थाली बहुत हैं। दूसरी ले जाओ। उन्होंने जिद की। आप भी साथ खाएं। पर दूसरे कमरे में अंजुम साहिबा (अंजुम रहबर) थी और तीसरे में डॉ कुंवर बैचेन थे। अब उन दोनों की बातें अगली किस्तों में ।
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परिचय की जरूरत ही नहीं -
जो शायरी जानता है। समझता है। बशीर की इज्जत करता है। जो नहीं जानता वह बशीर को पूजता है। मेरे ख्याल से मैंने अपनी जिंदगी मंे एक शख्स एेसा नहीं देखा जिसने कभी बशीर साहब की कोई शायरी न पढ़ी या सुनी हो।
--


बशीर बद्र , 15 फरवरी 19३५
56 साल से हिन्दी और उर्दू में देश के सबसे मशहूर शायर
दुनिया के दो दर्जन से ज्यादा मुल्कों में मुशायरे
दर्जनों किताबें
पसंद-ए-जायका- दाल रोटी और सब्जी
-
तेरह साल की उम्र में लिखी रचना

उजाले अपनी यादों को हमारे साथ रहने दो
ना जाने किसी गली मेंे जिंदगी की शाम हो जाए

Saturday, December 12, 2009

जय हनुमान

जय हनुमान

वेलेंटाइन की रात जब घर लौटा तो टीवी पर जब हनुमान भक्तों की बहादुरी का नजारा दिख रहा था( हालांकि अखबार में होने की वजह से मुझे उनके कारनामों का पहले ही पता चल चुका था( लाइव तो दिखा नहीं कुछ हां जो कसरी बाकी थी हमारे दर्शकखोर न्यूज चैनलों ने पूरी कर दी( कैमरे के आगे हनुमान के उत्पाती भक्त और शिव के बौराए चेलों की करतूतों को देख रहा था( देर रात तक सारे न्यूज चैनलों पर यही तमाशा जारी था( एक ओर मोहब्बत करने वाले लोग थे दूसरी ओर मतांध भक्त थे और तीसरे ओर मीडिया वाले थे( ज्ञान बाचते हुए मुहब्बत पर हुए जुल्म की कहानी दिखाते, सब कैश हो रहा था( टीवी पर मसाला था, चुप बैठे समाजशास्त्रीयों और मनोवैज्ञानिकों को बोलने का अचूक अवसर मिला था, सो सभी बोले जा रहे थे( चारो दिशाओं से अलग अलग राय थोपी जा रही थी( कोई हिंदू और हिंदुस्तानी परंपरा की दुहाई दे रहा था कोई पश्चिमी संस्क2ती को गाली दिए जा रहा था( कुछ मोहब्बत के पक्ष में खडे थे( कुछ उसके विरोध में, कुछ स्वयं निरपेक्ष थे, हर ओर लामबंदी जारी थी( देखते देखते कब नींद आ गई पता ही नहीं चला
शायद सुबह के चार बजे होंगे( दरवाजे पर कोई आहट सी सुनी थी मैने, वातावरण में शांती सी छाई थी( दरवाजा खुला तो देखा सामने हनुमान जी स्वयं साक्षात पहुंचे थे, मैं चौंक गया था, लाल लंगोट धारी हनुमान जी ने मुझसे कहा मैं तुम्हें ले जाने आया हूं( वह मुझे लेकर चल पडे( दरवाजे के बाहर निकलते ही मुझे भक्तों की भीड दिखी( सबने समवेत स्वर में जय हनुमान कहा(
जय हो( हनुमान बोले(
तभी अचानक तूफान सा उठा
सामने एक तेज रोशनी आई
बतातें हैं कि भोले बाबा अपने बौराए भक्तों के साथ पहुंच गए थे
वेलेंटाइन मुर्दाबाद के तेज नारे गूंज रहे थे
सामने से कुछ और देव पहुंचे
पता चला पंचायत का वक्त हो चला है
मयराष्ट में आज पंचायत होनी थी(
पंचायत लगी
देवों की दिव्य पंचायत
मैं कुताZपायजामाधारी सामने खडा था
हनुमान जी बोले
बेटा कैमरा कहां है
शिव बोले लगता है आप पिं्रट वालों को उठा लाएं है
अरे तब लाइव कैसे होगा
देवों की पंचायत में चिंता दिखने लगी
पहले पत्रकार रह चुके नारदस्वामी पहुंचे
उन्होंने कहा इसके पास कुछ इलेक्टानिक वालों का नंबर है
उसे फोन करो बच्चा
मैंने अपनी जेब टटोली
मोबाइल तो मैं बिस्तर के सिरहाने छोड आया था
मैं नारद जी ओर नतमस्त हो बोला
प्रभू आप तो सबसे वरिष्ठ पत्रकार हैं
आप ही कोई रास्ता बताओ
नारद जी ने अपनी राग छेडी
देखते ही देखते वहां सभी हिंदी न्यूज चैनल वाले पहुंच गए
ओवी वैन तैनात हो चुकी थी
मंच सज चुका था
तभी घंटा बजा
सर रेडी ,,
जय हो
कैमरा रोलिंग

टीवी वाले हनुमान जी के पास पहुंचे
सर सबसे पहले अपने बारे में बातइए
क्वीक बाइट
मैं रामभक्त हनुमान, राम नाम जपता हूं, भक्तों के बुलावे पर पहुंचा हूं
सवालों का दौर शुरू हुआ
हनुमान जी आपके भक्तों ने जो किया, उसके बारे में आप कुछ कहना चाहेंगे
देखिए मैं कोई राजनेता तो हूं नहीं,



तुम्हारी राय जानने आया हूं, टीवी और अखबारों में तो तुमने सब देखा( अब तुम क्या सोचते हो, मैंने कहा हे हनुमान
क्या प्रेम करना पाप हैं
बोले नहीं
तो प्रेम का विरोध
मयराश्ट से लेकर महाराश्ट तक
हर ओर विरोध
बोले
रामभक्त बोले
यह िशवसेना वालों का अपना मामला है

इतना सुनते ही टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग बदल चुकी थी देश भर के टीवी चैनलों पर धड़ाधड़
िशवसेना पर गुस्साएं हनुमान
चल चुका था
हनुमान एक बार फिर हिट थे
लोग
उधर एक िक्वक चैनल में हनुमान के विरोध में
िशवसेना की बाइट चल रही है
हनुमान भूल गए हैं
उन्हें भूलने की आदत है
राम ने भी याद दिलाया था
उनको उनकी अपनी ताकत का
अब हम दोबारा कोिशश करेंगे(
कुछ
पिछल्लगू किस्म के चैनलों पर भी
वही बाइट चुराकर चलाई जा रही थी
एक अन्य चैनल पर एमएनएस वाले ऑन एयर हो चुके थे
कुछ अंग्रेजी चैनलों ने भी हिंदू देवताओं को
चैनलों पर लाइव चैट के लिए बुलाया
पूरे मामले में हर ओर टीवी हिट था
यह सारा नजारा टीवी पर चल रहा था
ऐसा ही एक टीवी पूजा के प्रेमी के घर भी लगा था
टीवी पर हनुमंत कहानी देख पूजा अपने प्रेमी से बोली
डियर डू यू हैव ऐनी सेंस
तुम मेरे लिए फूल नहीं लाए
राजेश बोला, लाया हूं
जरा देना
उसने टीवी चैनलो के नाम फूल
चढाए
श्रदधासुमन अर्पित करने के बाद उसने टीवी बंद कर दिया
बोली जय हनुमान
इधर टीवी चैनलों की
टीआरपी कम होते ही
स्वर्गलोक में गुस्सा पसरने लगा था ओवी वैन वाले
तार समेट रहे थे(
इंद्र को गुस्सा आया
उसने कहा टीवी टीआरपी जगत में मेरी
बाइट के बगैर यह कैसे खबर चली
उसने सबको मना कर दिया
लाल लंगोट धारी ने मुझे वापस घर पर पटक दिया
और मैं घर बैठा सुबह अखबार का इंतजार करने लगा
अखबार में एक खबर छपी थी
जिसमें हनुमान ब्रांड के हिंदू भक्त
एक प्रेमी की पिटाई करते दिखाई दे रहे थे(
कैप्शन था
मोहब्बत पर सियासत
मेरे भी मुंह से निकला
जय हनुमान

Saturday, February 21, 2009

प्यार, पैसा और करियर

कहानी से पहले कुछ शब्द

मेरे बेहद करीबी दोस्त है
कई सालों से उनका अफेयर चल रहा है
जो अब टूटने की कगार पर है
उनकी जिंदगी में कई ऐसे मोड है
जो किसी मुम्बइया फिल्म के लिए धांसू मासाला साबित हो सकता है
खैर उनके लंबे जीवन के कुछ पलों से प्रेरित होकर और उसमें कुछ कल्पनाओं का घालमेल कर
मैंने यह कहानी लिखी है;
लिखना इसलिए जरूरी था कि
क्योंकि यही इस कहानी की नियती थी
बहरहाल
पेश है एक अजब कहानी

पहला प्रसंग


वह बंदा दिल्ली आया था
शायद 2000 की बात हो
कुछ सपनों के साथ और कुछ दोस्तों के कहने पर
कहीं घर में महसूस होने वाली
उब और बंदिशों से बचने के के लिए
आया था दिल्ली
उम्र बीस बाईस के पास रही होगी
उसकी एक प्रेमिका थी
जैसा उसने बताया
यहां दिल्ली में
जीवन में सकून था
जल्द ही काॅलेज शुरू हो गया
काॅलेज में एक लडकी से मोहब्बत जैसी कुछ चीज हुई
एक बार फिर
दोस्तों के कहने पर
प्रपोजल ठोका
लडकी ने इंकार कर दिया
वह पैसे वाली लडकी थी
यह ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास का बंदा था
वह सेंटी हो गया
दोस्तों के साथ दारू
पीकर भूलने की कोशिश करता था
समय गुजरता रहा

जाॅब की जददोजहद

पैसे घर से आने कम होने लगे थे
पिता जी कहना था कुछ टयूश्न वगैरह देखो
घर की दिक्कतों को देखते हुए
उसने नौकरी खोजना शुरू किया
पढने में ठीक था
एक नौकरी मिली
शुरूआती दिनों में
वह सारा ध्यान नौकरी पर देने लगा
कुछ माह बीत गए
उसे वहां एक लडकी दिखी
भोली सी
अपनी सी
उससे बात शुरू
हुई
कई बार दोनों ने
एक दूसरे की मदद की
अनजाने में
एक प्यारे से रिश्ते की
शुरूआत हो चुकी थी
दिन बीते
माह बीते
साल बीते
बंदे ने नौकरी छोड दी
दूसरी जगह नौकरी करने लगा
वह बहुत व्यस्त हो गया था
उसे काम के अलावा
किसी बात की फिक्र नहीं थी
खूब मेहनत करता था
तरक्की मिली
एक दिन जब वह कार्यालय
जा रहा था
तब
बस स्टाॅप पर
उसे वही पुराने आॅफिस वाली
लडकी दिखी
बाइक रोककर
वह उसके पास गया
दोनों में फोन नंबर
एक दूसरे को दिया
एक बार फिर
जिंदगी सुनहरी करवट लेने लगी
धीरे धीरे
बातचीत रंग लाने लगी
अब दोनों को
जब भी काम से फुसर्त मिलती
आपस में बतियाने में जुटे रहते
दिन बीते
माह बीते
कई बार मुलाकात हुई
कई रेस्टोरेट में
संगीतमय शामें
साथ गुजारी
मिलने की ललक बढी
और फिर
दोनों काम को
किनारे कर मिलने लगे
रिश्ते के भंवर कुछ गहरे हो चले थे
सब कुछ सुनहरा सुनहरा था
सपने जैसा सुनहरा
लडके के लिए
एक अच्छी नौकरी
एक अच्छी लडकी
लडकी के लिए
एक अच्छा साथी
एक नौकरी
दोनों
अपने
दोस्तों के बीच
एक दूसरे को प्रेमी प्रेमिका बताते
कुछ दिनों बाद
लडके ने उसे प्रपोज किया
कुछ नाज नखरे के बाद
लडकी मान गई
मगर
शादी के शत्र्त पर
रिश्तों का भंवर और तेज घूमने लगा था
अब दोनों एक दूसरे की फिक्र करने लगे
लडका खाना खाता है या नहीं
लडकी उसके लिए खाना
घर से बनाकर लाती
लडका
उसकी परवाह करता
उसे घर से
लाता और वापस घर ले जाता
इसी बीच
लडके के लडकी की जाॅब के बारे में पूछा
उसे कई दिक्कतों की बात कही
पहली बार

लडकी अपनी दिक्कतों का रोना रोती रहती थी
लडके की अपनी मुश्किलें थी
दोनों की दिक्कतों ने
एक दूसरे को करीब ला दिया
दोनों और करीब आए
एक दिन
किसी दुपहरी को
वह लडकी इसके घर पहुंची
वहां कोई नहीं था
दोनों के बीच
सेक्स हुआ
लडकी रोने लगी
लडके ने समझाया
लडकी का मन बहल गया
अब
यह दौर
अब हर
सप्ताह जारी रहने लगा
लडकी शादी की बात पर यकीन करती थी
लडका सपने देखता साथ जिंदगी के सपने
दोनों
हर सप्ताह मिलते
सेक्स करते
एक दूसरे के बारे में अच्छी अच्छी बाते करते
एक दूसरे के लिए ढेरो गिफट खरीदते
और काम में लगे रहते
इस बीच
सब अच्छा अच्छा होने लगा
सुनहरा
जिंदगी हसीन थी
प्यार से भरी हुई
सुनहरी
प्यारी
मगर
--
मुझे चेंज चाहिए

हां
उस दिन लडकी
यही तो कह रही थी
लडके से
मैं इस छोटी और घटीया सी
नौकरी से उब चुकी हूं
मुझे कुछ करना है
मुझे नाम , शोहरत और पैसा पाना है
लडके को भी यही चाहिए था
नाम ,शोहरत पैसा
पर लडकी के सपने ज्यादा बडे थे
उसे घर चाहिए था
कार चाहिए थी
नौकर चाहिए थे
अक्सर
इन बातों को सुनकर
लडके का मन उदास हो जाता
आखिरकार एक अच्छी नौकरी
उसने बदल दी
कुछ पैसों की खातीर उसने भी चेंज कर लिया
लडका नई जगह पर था
ज्यादा पैसे मिलते थे उसे
पैसों से वह अपनी
होने वाली बीबी के लिए
बहुत कुछ खरीदना था
वह उसके लिए घर खरीदना चाहता था
कार भी
नौकरी भी रखने की तमन्ना करता था
रोज रात को सपने में
वह इन चीजों का मालिक बन जाता
वह अक्सर
अपनी होने वाली बीबी को
इन सपनों की कहानी बताता
वह पैसे बचाने लगा था

लडका उसमें बीबी की खोज करता
लडकी उसमें पति को देखती थी
दोनों कुछ खोज रहे थे
मगर शायद
दोनों को कुछ मिल नहीं पा रहा था

इसी बीच लडकी के आॅफिस में
कुछ प्राब्लम हुई
लडके को बताया नहीं
खुद ही फेस करने की कोशिश की
कुछ दिनों बाद
लडके को बात पता चली
कि लडकी का बाॅस
उसका बाॅस उसे तंग करता था
हालांकि
लडकी की खुशकिस्मती देखीए
जल्द ही तंग करने वाला बाॅस बदल गया
नया बास आया
नई समस्याओं के साथ
अब
कुछ बेहतर होने की उम्मीद थी
मगर ऐसा नहीं हुआ
लडकी की स्थिति खराब होती चली गई
नए बास का एक विरोधी
पहले से कार्यालय में मौजूद था
वही लडकी की मदद के लिए आगे आया
लडकी ना नही कर सकी
अब आॅफिस में उस
लडकी की स्थिति बेहतर हो चली थी
जिसने उसकी मदद की थी
वह गुट प्रभावी होने लगा था
एक रात वापस घर जाने के लिए लडकी
बस स्टाॅप पर बस का इंतजार कर रही थी
मददगार बंदा
अपनी कार लेकर आया
लडकी ने ना नुकर की
फिर उसे बस में होने वाली दिक्कतों की याद आई
लडके जिस तरह से कुछ महसूस करने के चक्कर में रहते हैं
उसकी रूह कांप गई
वह झट से कार में बैठ गई
इस बीच
उसके प्रेमी का फोन आया
लडकी ने फोन नहीं उठाया
हालांकि
कुछ सोचकर
वह बीच रास्ते में ही उतर गई
रास्ते में मददगार बास ने
घरवालों के बारे में पूछा
कुछ दिन गुजर गए
लडकी का एक सहकर्मी कार्यालय में था
जिससे उसकी अच्छी बनती थी
दोनों एक दूसरे की मदद करते थे
रात को लडकी को घर जाना था
उसने अपने प्रेमी को फोन किया
बातों ही बातों में प्रेमी ने बताया कि
वह बिजी है
बातों ही बातों में
लडकी को कुछ याद आया
उसने अपने दोस्त को फोन किया
वह आया
उस दिन पहली बार
उसका दोस्त उसे बाइक के पीछे
बिठा कर घर छोड आया था
अब रोजाना उसे
कोई न कोई घर छोड देता
कोई नहीं मिलता तो
वह बस का प्रयोग करती
उधर लडका किसी काम से घर गया था
रोज बातचीत होती थी
कई बार कुछ अनबन सी हो जाती
मगर बातों ही बातों में सब सामान्य हो जाता
दोनों एक दूसरे से बंध चुके थे
मोहब्बत का बंधन मजबूत हो चला था
पर
हमेशा की तरह
नियति को
शायद इस बार भी
कुछ और
ही
मंजूर था

कयामत का दिन

हाल ही खरीदी गई
नई सूट पहनकर लडकी आफिस पहुंची थी
उसे लोग अच्छा बता रहे थे
केबिन के पास ही
मददगार बंदा उसे देख रहा था
उसने उसे बुलाया
उसकी तारीफ की
वह अच्छा काम करती है यह भी बताया
लडकी खुश होकर केबिन से निकल गई

दोपहर को लडकी कैंटीन में थी
अपने उसी सहकर्मी के साथ
मददगार बंदा पहुंचा
लडकी को बुलाया
लडके को हडकाया
बातों ही बातों में
किसी काम को जल्द
निपटाने को कहा
काम जारी था
तभी
लडकी को उसने बुलाया
बोला आज पार्टी है
तुम्हे चलना होगा

यहां बता दूं कि मददगार बंदा बीच बीच में
उसके काम पर निगाह रखता था;
अक्सर उसके घर तक छोड जाता था ;
उसकी बीबी थी ;
उससे बात भी कराई थी;
बच्चे भी थे
उनसे भी इस लडकी की बातचीत होती थी;
जी खोलकर
लडकी की मदद करता

लडकी
पार्टी में जाना नहीं चाह रही थी
मगर, वह मना नहीं कर पाई
कार पार्टी स्थल की ओर बढ चली
रास्ते में
बंदे को कुछ याद आया
बोला
अरे एक मिनट के लिए
घर चलना होगा
लडकी को कुछ शक हुआ
मददगार ने भांप लिया
कहा आप कार में बैठे रहना
मैं तुरंत लौअ आउंगा
मददगार का घर
एक महंगी लोकेलिटी पर था
लडकी सोच रही थी
मैं भी अपने
प्रेमी से कहूंगी
कुछ ऐसा ही मकान बनाने को
मैं भी तो अच्छी जिंदगी चाहती हूं
कार में सोचते सोचते
पांच मिनट गुजर चुके थे
मददगार वापस नहीं लौट रहा था
इस बीच
इसके प्रेमी का फोन आया
इसके कहा
आॅफिस में हूं
बाद मंे बात करता हूं
प्रेमी की बातों का उत्साह ठंडा पड गया था
दरअसल
वह घरवालों को रजामंद कर चुका था
उसके लिए कीमती तोहफे लाया था
मगर
वह बोल नहीं पाया
इधर कार में पांच और मिनट गुजर चुके थे
वह कार से उतरी
कुछ सोचती हुई
घर के अंदर दाखिल हुई
अंदर से अचानक आवाज आई
बस हो गया
आ रहा हूं
एक मिनट बाद
दोबारा आवाज आई
अंदर आ जाओ
घबराओ नहीं
पानी पी लो
लडकी ्िरफज से पानी
निकालकर पी रही थी
सामने से उसका मददगार बास
सज संवर कर आ चुका था
सामने दिखते ही उसने कहा
अब तुम इतनी अच्छी लग रही हो तो
मुझे भी अच्छा डेस पहनना पडा
लडकी खुश हो गई
इस बीच दोनों बाहर आ गए
मददगार का मोबाइल अंदर रह गया था
उसने दोबारा दरवाजा खोला
मददगार शख्स ने लडकी की ओर देखा
आंखों में कुछ बात थी
दोनों घर के अंदर
कमरे में बैठ गए
आफिस की दिक्कतों से बात शुरू हुई
लडकी को सपोर्ट करने की बात बताई गई
बातों ही बातों में मददगार
उसके पास आ गया था
लडकी को पता चलने से पहले
उसका हाथ मददगार पकड चुका था
लडकी बिदक गई
उसने विरोध किया
मददगार ने हाथ नहीं छोडा
लडकी रोने लगी
मददगार अडा रहा
वह उसके कपडे उतार रहा था
कमरे में वह इधर उधर
भागती रही
मगर उसके कदम
रूक गए
लडकी रोती जा रही थी
उसने मददगार को एक जोरदार चांटा
मारा विरोध किया
सर यह गलत है सर
ऐसा मैं नहीं कर सकती
प्लीज
मैं मर जाउंगी
मगर पता
नहीं क्यों
उस दिन लडकी
ज्यादा देर तक
मना नहीं कर पाई
नए कपडे
उतार दिए गए
मददगार ने सेक्स किया
लडकी ने जिस्म को झेला

लडकी देर तक राती रही
जमाने की तस्वीर उसके सामने थी
गरीब मां बाप
प्रेमी, दोस्त
बेदर्द जमाने में वह लुट चुकी थी
वह मरना चाह रही थी
मददगार ने समझाया
एक घंटे बाद
दोनों आॅफिस पहुंचे
उस रात को
लडकी सो नहीं पाई
मददगार
उसके साथ सपने में दुराचार करता रहा
सुबह बोझिल सी
कुछ खोई सी
रूआंसी होकर
आॅफिस
पहुंची

अगले दिन

मगर यह क्या
लडकी की पूरे आॅफिस में चर्चा थी
मददगार ने उसकी
खबर की खूब तारीफ की थी
लडकी मीडिया में थी
दो दिनों बाद
वह प्राइम टाइम की एक्सक्लूसीव खबर कर रही थी
जल्द ही
उसका प्रमोशन हो गया
जिस्म झेलना उसकी मजबूरी बन गई थी
वह सिगरेट और शराब पीने लगी थी
खोई खोई सी रहती थी
मददगार ने उसकी हर इच्छा पूरी की थी
बगैर कुछ कहे और
बहुत कुछ पाकर

उसे पैसे चाहिए थे, उसे कई प्रमोशन मिले
नाम चाहिए था, प्राइम टाइम में मौका दिया गया
शोहरत चाहिए थी, मशहूर एंकर बन चुकी थी;

उधर लडके से वह आम दिनों की तरह मिलती रही
वह उससे आज भी उतनी ही मोहब्बत करती थी
बेईंतहा मोहब्बत
अपने जानू के लिए वह कई सामान खरीदती
लडका खुश हो जाता
दोनों साथ बिताते
उस दौरान वह लडकी
नार्मल दिखने का प्रयास करती
इस बातों और मजबूरियों से अनजान
लडके को पता नहीं चला कि
उसक दुनिया कितनी बदल चुकी थी
एक बार फिर
वक्त ने करवट ली
कुछ दिनों बाद
चैनल में
मददगार की स्थिति
कमजोर होती गई
राजनीति का दांव इस बार उल्टा पडा था
वह नौकरी छोडकर चला गया था
लडकी
अकेली रह गई थी
रात को बहुत दिनों बाद
उसे बस में जाने की जरूरत पडी थी
उसने पुराने दोस्त को फोन किया
बाइक वाले सहकर्मी आ गया
मगर
दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई
घर पर
उस रात
लडकी को नींद नहीं आई
करवट बदलती रही
अपने प्रेमी के बारे में सोचती रही
उसे याद आया
बीते कई माह से
उसे नींद आनी कम हो गई थी
नींद की गोली
उसकी जरूरत बन चली थी
इधर घरवाले
लडकी से कुछ
और पैसों की डिमांड करने लगे थे
रात को ऐसे लगा
उसे लगा
उसका प्रेमी
उससे दूर होने लगा था
वह कितनी कोशिश कर रही थी
मगर वह दूर जा रहा था
सपने में अब
मोहब्बत के बजाए
दिखने लगी थी दूरियां

छुटृटी वाले दिन
कई माह बाद
दोपहर को
दोनों पुराने प्रेमी
दोबारा मिले
दोनों ने शिकायत की
अब तुम पहले जैसे नहीं रहे
उस दिन भी
लडकी के फोन पर
आॅफिस से फोन आते रहे
इधर शाम को जब
दोनों एक दूसरे में खोने लगे थे
तभी
उन निजी क्षणों में
लडकी का फोन
रिंग करने लगा
सेक्स छोडकर
वह फोन पर बात करने लगी
बात जब थोडी लंबी हो गई तो
लडके को सहन नहीं हुआ
वह बाथरूम चला गया
वापस कमरे में दाखिल
होते वक्त लडकी ने पूछा
कहां चले गए थे
तुम तो
कुछ कर ही
नहीं सकते
बात कहीं चुभी थी
खैर
दोनों में
बातचीत हुई
दोबारा सेक्स भी हुआ
साथ मरने जीने
की कसमें
खाकर दोनों विदा हुए
इधर
लडके की नौकरी पर खतरा मंडराने लगा
उसके यहां माहौल ठीक नहीं था
मंदी की
ताजतरीन मार
सब पर पडने लगी थी
इस बीच
लडके ने
नौकरी के लिए
उसी मददगार को फोन किया
फोन पर मददगार ने उसके काम की सराहना की
पर नौकरी देने से इंकार कर दिया
लडकी को फोन कर वह कुछ
बताने वाला ही था कि
लडकी का फोन आया
मददगार शख्स की बात बताते हुए
लडकी बोल रही थी
सर ने मुझे नई नौकरी दे दी है
ओफ वह कितने अच्छे है
मैं तुम्हारे लिए भी
उनसे बात करूं
क्या
लडके ने मना करते हुए
फोन काट दिया
आज
वह कुछ हार गया था
पुरानी उस दिन वाली बात याद आई
सेक्स के दौरान
फोन आने की घटना
कमाल है लडकी फोन
उस वक्त वह फोन कैसे
उठा सकती थी
वह कुछ उलझन में था
सामने दीवार थी
हाथों में फोन था
अचानक आए
गुस्से ने फोन और दीवार का
तालमेल करा दिया
फोन जमीन पर टुकडो टुकडो में पडा था

-
फिर नई नौकरी

लडकी को नई नौकरी मिल चुकी थी
वह खुश थी
उसे प्रेमी से ज्यादा पैसे मिलते थे
अंदर ही अंदर
उसे इस बात का गहरा सकून मिल रहा था
उधर दोनों की बातचीत अब
आफिस खबर और पैसे को
लेकर ही होती थी
शादी और कसमें भी
इसका हिस्सा हुआ करती थी
मगर कभी कभी

अब दोनों नए तल पर थे
इस बार लडकी उंचे तल पर थी
उसके पास अच्छी नौकरी और पैसा था

इस बीच
मददगार ने एक और दांव खेला
लडकी को बुलाया
बोला यार
हमारे
यहां प्राइम टाइम में लिए स्लाॅट खाली है
लडकी ईशारा समझ चुकी थी
उसके मुंह से गालियां निकल रही थी
लडकी ने गाली देते हुए सिगरेट सुलगाया
कुछ सोचने के बाद
वह राजी थी
मगर दिक्कत कुछ और थी
प्राइम टाइम का प्रोडयूसर कोई और था
सीधे कहे तो
इस लडकी को
उसे खुश करना था
हर तरह से
वह इसके लिए तैयार नहीं थी
मददगार बोलता रहा
वह सुनती रही
सिगरेट को जमीन पर फेंकते हुए बोली
कहां जाना होगा
अगली सुबह
वह
प्रोडयूसर के घर पर थी
उस काले मोटे को देखकर
वह कांप गई
मोटा सब कुछ एक बार में ही पाना
चाहता था
मोटा उसके सामने अपना नंगा जिस्म लेकर
खडा था
लडकी ने मुंह बंद किया
आंखों से आंसू आ गए
वह उसे झेलती रही
मोटा उसे नोंचता खसोटता रहा
लौटते वक्त
कार में बैठी
लडकी सोच रही थी
राक्षस साला
आगे तो देखा भी नहीं
सिर्फ
पिछे ही
खैर
जल्द ही
उस चैनल में
प्राइम टाइम का शो
चलने लगा था
लडकी स्टाॅर बन चुकी थी

इधर लडका भी नई नौकरी तलाश चुका था
उसे बेहतर पैसे मिलने लगे थे
अपनी नौकरी से खुश था
शादी करना चाहता था
रोज टीवी पर होने वाली बीबी को देखता था
अब तो उसके
घरवाले भी देखते थे
वह फोन करता
तो वह बिजी रहती
सुबह से शाम तक
बिजी
रात को भी बिजी
कुछ टूट रहा था
दोनों के बीच

शायद
नीले भंवर का रंग हल्का हो चला था
प्रेम का प्रवाह मंद पडने लगा था
दोनों
शादी के फैसले के बारे में
दोबारा सोचने लगे थे
बडे दिनों बाद
उस रात
लडक ने शराब पी
खूब पी
अब वह रोज
शराब पीता था
लडकी के बारे में सोचता था
उसके सपने का क्या होगा

उधर
लडकी के नए चैनल में
प्रोडयूसर को तीन माह बीत चुके थे

अब प्रोडयूसर भी तंग आ चुका था
रोजाना एक ही जिस्म से तंग आ चुका था

मददगार का फोन आया लडकी के पास

बोला यार तुम कुछ दिनों के लिए छुटटी ले लो
लडकी समझ नहीं पाई
पर राजी हो गई

उसे शिमला जाने के पैसे दिए गए
मददगार से साथ जाने से इंकार कर दिया
काला प्रोडयूसर जा नहीं रहा था
अब उसने प्रेमी को फोन किया

दोनों शिमला गए
साथ
मददगार के पैसे पर
शिमला का मजा

रात को जब दोनों
बिस्तर पर थे
लडकी उसे शराबी हो जाने पर भला बुरा बोल रही थी
लडके के सामने आज उसने पहली बार शराब पी थी
दोनांे साथ साथ शराब पी रहे थे
सामने टीवी आॅन था
तभी उसके चैनल पर प्राइम टाइम का स्लग दिखा
सामने एक
नई खुबसूरत लडकी दिखी
अरे
लडकी चिल्लाई
यह कैसे हो सकता है
उसने सीधे प्रोडयूसर को फोन किया
प्रोडयूसर का फोन बिजी था
मददगार को फोन किया
इधर लडका हैरान था

फाॅरप्ले के बाद सेक्स से ऐन पहले
लडकी का फोन पर बिजी हो जाना
परेशान हो जाना
उसे कुछ समझ में नहीं आया
वह चिल्लाया

उधर लडकी फोन पर चिल्ला रही थी
टीवी पर
वह नई वाली एंकर
चिल्ला रही थी
शोर हर ओर शोर
लडकी बोली
मददगार यह क्या है
मददगार ने उसे समझाने की कोशिश की
उसने साफ कहा
तुम्हारी टीआरपी डाउन हो रही थी
अब ज्यादा टीआरपी चाहिए
इसलिए नई लडकी लाई गई थी

लडकी ने फोन फेंक दिया
नंगे बदन ही खिडकी के पास पहुंच गई

कुछ घंटे बाद
वहां सन्नाटा था

रात के उस सन्नाटे में
कई गुमनाम चीजें थी
किसी के रोने की आवाज थी
एक घुटन
कई सवाल
हवा में
तैर रहे थे
शराब की बदबू
(अगर आप चाहें तो खुशबू भी मान सकते हैं) थी
लडकी उल्टी पडी थी
नींद शराब और frustration
लडके की नींद टूटी
उसने
सामने पडा जिस्म देखा
उसका
frustration
सामने आ गया
वह कुत्तों की तरह
उस पर टूट पडा
वह प्यासा था
सब कुछ
खा जाना चाहता था
एक ही बार में
समूचा
वह पागल हो गया थ
अंधा पागल
कई दिनों का frustration
सामने आ गया था
लडकी चिल्लाइ
लडकी र्का
frustration
बाहन निकला
वह गुस्से में थी
लाल
चिखती हुई बोली
तू भी मेरी मारना चाहता है
ले मार ले
घुसा दे अंदर
बुझा ले प्यास
frustration
लडके ने वैसा ही किया
मगर दूसरे ही सेकेंड ठिठका
उसने कुछ सुना था
तू भी मेरी मारना चाहता है
हां यही शब्द थे
उसकी होने वाली बीबी के
वह
रूक गया जोश ठंडा पड गया
उसने पूछा
तू भी का मतलब क्या है
अरे यार कुछ नहीं
लडकी ने कहा
वह डर गई
लाल चेहरा
फक पड गया
मैं सपना देख रही थी
मुझे लगा ..
कोई मेरे साथ
जबरदस्ती कर रहा है
..
लडका समझ चुका था
frustration
लडकी भी समझा चुकी थी
..

सुबह
सामान पैक था
दोनों ने
टूर कैंसल कर दिया
बताते हैं
कई दिनों तक
दोनों में बात नहंी हुई
फोन पर घंटों चिपके रहने वाले
एक
मिस काॅल करने और पाने को तरस गए
एसएमभी नहीं भेजा
इधर

चैनल में लडकी की टीआरपी डाउन हो चली थी
लडका काम और उस लडकी के बीच उलझ चला था
तभी
नियती का एक और पासा
खतरनाक खेल

एक ब्रेकिंग न्यूज

लडके को मिली
अरे यार
उस चैनल में
एक प्राइम टाइम एंकर थी
अभी तीन माह पहले आई थी
जिसकी चर्चा है बहुत आज कल
हां
याद है ना
शायद
तू तो उसे जानता है
ना अरे नहंी
क्या हुआ ?
उसका एमएमएस आया है नया
वह देखना नहीं चाहता था
पर दोस्त को मना नहीं किया
ब्लूटूथ से
एमएमएस लेते वक्त
लडके को
पसीने आ गए
प्राडयूसर ने
उसके साथ गुजारे निजी
वक्तों का
एमएमएस बनाया था
बेहद अश्लील

"tu भी मेरी मारना चाहता है"

उसे बहुत कुछ
समझ आ चुका था
रात
उसे नींद नहीं आई
तनाव में उसने गोलियां खा ली
20 नींद की गोलियां

लडकी भी बेहद तनाव में थी
तनाव कम
पछतावा ज्यादा
बेचारगी भी छुपी हुई
सामने
गरीब मां बाप
और
दूर जाते
प्रेमी की तस्वरी
सी चल रही थी
बेददर्ज जमाने की रूखी तस्वीर
वह प्रोडयूसर का
खून करना चाहती थी
मददगार को मौत देना चाहती थी
मगर वह
ऐसा कर नहीं पाई
शराब पीकर उसने
कुछ गोलियां खा ली


नियती देखिए
दोनों एक ही अस्पताल में लाए गए थे
दोनों ने ही नींद की गोलियां खाई थी
दोनों ने शराब भी पी थी
उस अंधेरी और सर्द रात को

सरकारी अस्पताल के डाॅक्टर
उन दोनों को बचा नहीं पाए
मौती जीत गई
जिंदगी हार गई
उन दोनों का
अंतिम संस्कार
अलग अलग हुआ
दोनों की रूह
उनके जिस्म से निकल
कर आमने सामने बैठ गई
उनमें भी
बात तक नहीं हुई
कोई संवाद नहीं हुआ
एक सन्नाटा सा छा गया
मगर
दोनों
किस वजह से मरे
इसका उत्तर आपको देना होगा

शुक्रिया

Saturday, February 14, 2009

वेलेंटाइन की जिंदगी थी

खुदा को गालियां देता था कोई

अजब अंदाज की ये बंदगी थी,

कि दिन में याद नहीं करता था कोई

रात को रोज यही शिकायत थी,

जमाने में रिवायतों का यह खेल देखो

वो साथ नहीं मेरे यही मोहब्बत थी,

कल टोका जो उसको तो कहा उन्होंने

यही वेलेंटाइन की जिंदगी थी !!

जो भी होगा वह अब कम होगा

कुछ लिखूं तो कम होगा
कुछ कहूं तो कम होगा
मुझे तलाश थी जिसकी
वो मेरे सपनों सा कब होगा
जिंदगी शायद सपनों सी खुशहाल न होगी कभी
मौत तू मेरे दामन में कब होगा
जुस्तजू बाकी न रहेगी दिल मंे कोई
उसके गोद में जब मेरा सर होगा
मैं नहीं जानता की आगे क्या होगा
पर जो भी होगा वह अब कम होगा !!

Monday, August 18, 2008

`पिता ´

पहले दो शब्द

डायरी के पुराने पन्नों के बीच के कुछ शब्दों पर एक बार फिर नजर गई। उन्हें यहां आपके सामने पेश कर रहा हूं। दिल्ली में मेरे शुरूआती सालों की बात है। मेरे बेहद करीबी एक श�स या यूं कहें दोस्त के पिताजी की मृत्यू हो गई थी। हिल गया था। बुरी तरह कांपा हुआ था। उनकी लाश को दिल्ल्ाी से रवाना करने के बाद रात भर सो नहीं सका था। उस डरावनी रात को डायरी में कुछ शब्द नोट किए थे। पता नहीं किसके लिए। तब भी समझ नहीं पाया था। आज भी कुछ वैसे ही हालात है।
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सादर साथी,
मैं इस जगत का प्रवासी पक्षी हूं। मौसम का पता नहीं। कभी कभार ही आ पता हूं। इस बार आया तो आपके बारे में देखा। दुख हुआ। निश्चय ही कठीन क्षण रहा होगा। पर। उबरना पड़ता है। जागतिक दुनिया की इस सच्चाई का एक बार फिर सामना हुआ। तो शब्द अनायास ही, कहीं से उड़ते हुए मेरे पास चले आए। उन्हीं शŽदों को इक्_ा कर आपके पास भेज रहा हूं। क्योंकि उसे अपने उद्गम के स्ाोत्र पर पहुंचना था। वतुüल जो अधूरा रहा गया था। उसे पूरा जो करना है। यही चक्र है।

`पिता ´

छोटे हाथों की
छोटी-छोटी
अंगुलियों को पकड़
तु�हीं ने तो
मेरे नन्हें पावों को
चलना सिखाया।
रात को
कंधे पर
थपकियां देकर
जागती रातों में
सपना दिखाया।
आज
मेरे हाथ
तु�हारे हाथों को
देख नहीं पाते
पर,
तुम ही थे
या
तुम ही होे
जिसने मुझे
जीना
बतलाया
बोलो ना
तुम हो ना ....

शुक्रिया
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Saturday, August 2, 2008

खून से सने हमारे सपने

खून से सने हमारे सपने
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हमारे सपने खून से सने हैं! जमीन पर बिखरी हुई हजारों लाखों लाशों की दुगZध और सड़ाध से भरे हैं! मरने से पहले पानी के लिए तड़पते प्यासे चेहरों, मौत के पहले और बाद के चिल्लाहट, अकुलाहट, डर, खौफ, आंसू , अकेलापन, निराशा और सन्न्ााटे से साराबोर है हमारे सपने। पर हमें पता ही नहीं। आभास तक नहीं है इसका। शायद पता करने का उपाय ही नहीं है। या है हमने कोशिश नहीं की । कारण जो भी हो पर हिला देने वाली (कई मायनों में दिल तोड़ने वाली और दिमाग के परखच्चे उड़ा देने वाली) सच्चाई का एक पहलू यह भी है कि कभी न खत्म होेन वाले हमारे सपने, साथियों के क्रब कीमत पर गढ़े गए हैं। खास हमारे लिए।

दरअसल हम
सपने देखना नहीं छोड़ते।
चाहते भी नहीं ।
प्यारे प्यारे सपने।
खुशियों से भरे ,
स्वर्ग के सपने।
हमारे और आपके सपने।
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द्वितीय विश्व युद्द की लड़ाई की कई मशहूर कहानियों और उनके पात्रोंं से आपका भी परिचय होगा। अब भला सपनों का इन कहानियों से क्या संबंध। है ना। बेहद गहरा संबंध है। आगे बताउंगा। 1944 में यूरोप की जमीन पर लड़ाई जारी थी। उस वक्त भी जर्मनी और मित्र देशों के घरों में रात की आगोश में सोएं लोग सपनो में खोए थे। इधर हालिया कारगील का युद्ध तो आपको याद होगा ना। टाइगर हिल पर हिंदुस्तानी झंडा को वापस लहराने के जारी जद्दोजहद के दौरान आप क्या कर रहे थे। मैं तो सपने देख रहा था। शायद हर रात आप भी सपने ही देख रहे होंगे। वह भी भूल चुके हैं तो दुनिया भर में जारी आंतकवाद और उससे आपको बचाने में जुटे लोगों को आप जानते ही होंगे! क्या? नहीं जानते। मैं भी बड़ा बेशर्म हूं। नहीं जानता। कितनी आसानी से हम यह बोलकर बोझ से बचने की कोशिश करते हैं।
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वापस दूसरे विश्व युद्ध पर आते हैं। यहां एक अजीब सी कहानी भी गढ़ी गई है। सेविंग प्राइवेट रयान तो याद है न आपको। नहीं है। तो जान लीजिए। फिल्म बनी हुई है। जंग की पृष्ठ भूमि पर बनाई जाने वाली मुंबइया मसाला फिल्मों से बेहद अलग इसमें सच्चाई को दिखाने का बेहद खूबसूरत और विभत्स (हां, फिल्म देखते वक्त, कई दफे यही �याल आता है जेहन में ) रूप दिया गया है। जंग की हार और एक बहादुर सैनिक के बचाने की जीत की खूनी जद्दोजहद पर अधारित यह फिल्म आपके सपनों का सही रंग आपके सामने पेश कर देगी। एकदम नंगी तस्वीर। रणभूमि की असली तस्वीर। सीधे जंग के मैदान से। तब शायद आपको यह एहसास हो (न भी हो, तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा) । अगर हो तो। समझना थोड़ा आसान रहेगा। कि क्यों मैं सपने को बोçझल बताने की हिमाकत कर रहा हूं।

(
नहीं
यह फिल्म
केवल यूहदियों के लिए नहीं है।
केवल अंगे्रजों के लिए नहीं
केवल कैथोलिक के लिए नहीं
केवल प्रोस्टेंट के लिए बिलकुल नहीं
केवल
हमारे और आपके लिए है।
उन बेगैरत किस्म के लोगों के लिए ।
जिन्हें सिर्फ अपने सपनों की परवाह है।
जहां व्यçक्तगत महत्वकाक्षाएं हावी है हमेशा
लाशों की कीमत पर भी ।
हमारे और आपकी कीमत पर
खुद की कब्र पर )
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हजारों लोगों के खून से सने है ।
आपके सपने । हमारे सपने।
इन पर कई अजनबियों के खून का
अनजान और खौफनाक साया है।
लथपथ जिस्मों और बेजान होते,
कुछ हो चुके
अंग भंग टुकड़ों के बोझ से दबे हैं
सपने खून से सने हुए हैं
हमारे सपने।
आपके सपने।
देशवासियों के सपने।
सपने तो हम मानवों के है
पर पृष्ठभूमि हैं जानवरों वाली है
आदिम एकमद आदिम
लड़ाकू, हिंसालू
मानव जाति के सपने।
खून से लथपथ सपने।
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रेड लाइट पर एक दूसरे से आगे बढ़ने के चक्कर में भिड़ जाने वाले। सौ -हजार रुपये के लिए एक दूसरे की मार-पीट करने वाले। बहादुरी की झूठी मिसाल देने वाले ,कायर और कमजोर किस्म के लोग ,सीधा कहें तो हम और आप । हमारे और आपके जैसे लोग। देश की सरहद सुरक्षित सीमाओं के बहुत अंदर, बेफि्रक होकर कैरियर की सीढ़िया चढ़ते । चलते, रूकते, खाते , सोचते और सोते हुए । संसद और देश में काबिज होते भ्रष्टाचार पर दिन रात चिंता जताते वक्त हम शायद यह भूल जाते हैं कि दुनिया में बहुत सारे लोग महज हमारी छह घंटे की निंद के लिए अपने हर पल जान पर दांव लगा देते हैं। वह न ही हमारे रिश्तेदार है। ना ही कोइ पड़ोसी। सबसे खतरनाक यह है कि हमें कभी मालूम भी नहीं पड़ता कि हमारे सपनों को बचाने के लिए हर पल न जाने कितनी जिंदगी लाशों में बदल जाती है।
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काश, ऐसा नहीं होता ।
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Monday, July 28, 2008

मेरे भाई ! तुम भी !

पहले दो बातें । `मेरे भाई ! तुम भी ! ´ की Žलॉगिया पोस्टींग के बाद मेरे पास कई फोन आए । भाई लोगों ने दो सहानुभूति भरे मेल भी भेजे हैं । बगैर चेहरे वाले एनॉनमस साहबों ने कुछ कमेंट भी बतौर भेंट भेजी हैं । जिसमें इसे बेहद गंदी और अश्लील कहानी बताकर हटा लेने को कहा गया । मुझे और मेरे ब्लॉग को गंभीर बताया गया है । जबकि इस कहानी को ओछा कहा गया । निर्णय सुनने वालों ने इसे मेरे प्रतिष्ठा या इमेज के अनुरूप नहीं होने की बात पर खूब जोर दिया है। लोक लज्जा की भरपूर दुहाई दी । कहा इसे वापस ले ले । पर मैंं ऐसा नहीं करूंगा । क्योंकि मैं सेक्स को ओछा या छोटा या हल्का फुल्का नहींं मानता । हम भलें ही इसे ज्यादा तवज्जो न देते हों पर हम इससे और यह हमसे अलग नहीं है । मैं पक्ष और विरोध से भरे सेक्स पर कोई विमर्श या बहस में नहीं पड़ना चाहता । हां इसके सर्वव्याप्त दैहीक व्याकरणों से अलग नए आयामों की बात करना जरूर चाहूंगा । और अगर आप मानते हैं कि यह सब बेकार है । सेक्स्ा के बारे में बात करना गैर गंभीर है तो एक विनम्र विनती है । उस स्थिति में सबसे बेहतर यही होगा कि इस ब्लॉग का रुख मत कीजिएगा । क्या पता उसमें कोई आपकी कहानी ही दिख जाए । उ�मीद है आप समझेंगे ।




मेरे भाई ! तुम भी !


बीती रात नोएडा में कहीं बैठा था

टाइमपास करने का मूड था

रोचक गप्पों का सुहाना दौर जारी था

निंदा रस में डूबे बातें कर , मजे लूट रहे थे

गप्प हांकने

और

हंसने- हंसाने के उस दौर में

अचानक

साथ बैठा साथी संजीदा हो उठा ।

भर्राए हुए आवाज में

हाथ उठाते हुए बोला

!!!!!! यार ! !

!! इससे तो मौत भली होगी !!!

हवा में ही अजब-गजब तरीके से हाथ हिलाते हुए उसने

कई तरह की मुद्राएं बनाई

कुछ बेहद श्लील, शालीन और

कुछ हद से ज्यादा अश्लील

कई

भद्दी भी।

आरामदायक कुर्सी पर आसन लगाए

वह पैरों को फुदकाने लगा

तेजी से उछलने लगा ।

फिर

चिल्लाया

!!! कुछ हो ही नहीं रहा है यार

` दस दिनों के अंदर इंतजाम नहीं हुआ तो मैं मर जाउंगा´

जानना चाहेंगे की वह क्या बात करना चाह रहा था । दरअसल इन दिनों वह बड़ी शिद्दत से `कुछ´ पाने की जुगत में जुटा था । जिस्मानी जरूरतों को पूरा न हो पाने की वजह से वह बेहद परेशान चल रहा था ।

दांत निपोरते हुए

हर शŽद को चबाते हुए

बोला

`सावन आने के बाद मन बहकने लगा है´

मेरे भाई

चमकती ,दमकती ,दहकती

चौड़ी होती आंखों

बताया

कई दफे, कईयों के साथ यहां-वहां कुछ कोशिश भी की।
पर पाने में कामयाब नहीं हो पाया ।

अब तुम बताओ

मुझे क्या करना चाहीए ?

महोदय का मानना है कि उनकी जिस्मानी जरूरत उनके कामकाजी दिमाग पर हावी होने लगी है । सो , उन्हें इसे पूरा करने के इंतजाम करना चाहीए । वैसे बीच में कुछ दिन बेहतर `व्यवस्था´ भी हो गई थी । सो, कुंवारों लड़कों वाली आदत भी नहीं रही। अब तो पूरा और समूचा जिस्म ही चाहीए । उन्हें । बातों बातों मेंं ही उनकी लपलपाती जीभ बाहर निकलने लगी । जैसे गर्म गोश्त , बहकते जज्बातों , उमड़ती घुमड़ती भावनाओं और फड़फड़ाते जिस्म का साथ पा लेने के मादक एहसास से सराबोर हो उठीं हो ।

कहने लगेे भाई ।

आपने इस मौसम में सेक्स किया है।

इससे पहले की कोई जबाब दे पाता

एक और सवाल उन्होंने दाग दिया

अच्छा

यह बताओ कितने दिन पहले किया था ?

मेरे मुंह खोलने से पहले ही

गजब की फुतीü दिखाते हुए

मूलाधार केंद्र से निकली उर्जा से लबरेज होकर

भाईसाहब ने हाथें भिंच ली ।

बीते दस मिनट से जारी जिस्मानी बातचीत में

पहली बार धीरे से बोलें ।

बहुत मजा आता है ना !!!

जनाब लगातार बोले जा रहे थें

बार-बार

लगातार

जिस्म !

जिस्म !!!

बेदाग जिस्म !!

मादक और मोहक जिस्म !!

समानुपाती औरताना जिस्म!!!

बस जिस्म ही बन गए थे वह

कुछ देर तक ।

फिर चुप हुए

हाथ मुंह सिकोड़ा ,

कहा
यार


कीभी जी. बी. रोड गए हो ?

तुम तो दिल्ल्ाी में बहुत दिनों से हो

कितने में मिलती है ?

कैसी मिलती है ?

यह बताओ ?

लालकिले से किधर जाना होगा ?

मुझे रास्ता मालूम था ।

है भी ।

उन्हें बताया ।

तो चौकें

कहा

मेेरे भाई !

तुम भी ? ! ? !

Sunday, July 27, 2008

जवान देश बूढ़े लोग

जवान देश बूढ़े लोग

-उन दोस्तों के लिए जो समय से पहले बूढ़े हो चले हैं

मेरे कुछ दोस्त हैं । पैदाईश की उम्र को पैमाना मानें तो माशाअल्लाह गबरू-जवान कहलाने लायक हैं । पर जवानी उन्ामें झलकती नहीं । जोश नहीं मारती । पतला वाला तीस के करीब पहुंच चुका है । मोटा दो साल पीछे है। ढलती शाम के साथ ही दोनों के कंधे झुक जाते हैं । चेहरे पर पीलापन हावी होने लगता है । बुझा-बुझा सा दिखता चेहरा चिल्ला चिल्ला कर बुढ़ापे से उनकी बढ़ती नजदीकी को बयान करते हैं ।

बात महज जवानी से दूर होते बॉडी-लैंग्वेज तक रूकी रहती तो खैर था । क्यां बताएं इन दिनों उनकी बातचीत का लहजा भी खतरनाक हो चला है । महज चार-पांच साल पुरानी नौकरी में पचास साल का अनुभव पा चुके इन दोस्तों के तर्क भी अजब गजब है । हर ओर छाई उदासी और खतरे को खुद से सबसे पहले जोड़ने लेत हैं । मुझे बहुत फिक्र है मेरे भाईयों । क्या होगा तुम दोनों का ।

उनको देख ऐसा लगता है जैसे छत के उपर मुंडेर पर काला लिहाफ ओढ़े खतरनाक बुढ़ापे का साया उन्हें लगातार पास बुला रहा है । झूलते चेहरों वाले, सफेद बालों और थकी हुई आंखों पर चश्मा लगाने वाला वह चेहरा डरा रहा है । और जवानी । जैसे दूर किसी छत पर खड़ी अलमस्त जवान औरत की तरह बन गई है। पास आने को तरसा रही है । लगातार बढ़ती दूरी का नशतर चुभा रही है ।

वैसे यह इन दो दोस्तों की बात नहीं है । ऑफिस में जुटे कामकाजी सहयोगियों पर भी ढलती हुई उम्र का असर दिखता नजर आ रहा है । मिला-जुलाकर एक बेचारगी सी झलकती है सबके चेहरे पर । लड़ने को कोई जज्बा नहीं बचा है किसी में । पैदा हो गए थें । सो किसी तरह समय काटने के लिए खा पका रहे हैं ।

सच कहूं तो गहरे अर्थों में यह मुल्क भी बूढ़ा हो चला है । समय से पहले रिटायरमेंट प्राप्त कर चुका बुजूआü मुल्क । विश्वास नहीं होता हो , अपने करीब मौजूद किसी छोटे बच्चे से सवाल पूछीए । जिंदगी और मौत के बारे में उसके विचार जानने की कोशिश कीजिए । उससे तीन गुणे ज्यादा उम्र का पढ़ा लिखा विदेशी भी उतना नहीं बता पाएगा । जितना हमारे देश का छोटा बच्चा जिंदगी और मौत के बारे में अधिकार भाव से बोलता नजर आएगा ।
आप शायद इसे संस्कारों की संज्ञा देंगे । पर मैं इसमें खो गए बचपन की बालपन को देखता हूं । खेलने कूदने की उम्र में ही गंभीर हो चला है । तत्व ज्ञान जैसी बातें करता है। और हम मुग्ध हैं । वाह! इट हैपेन्स ओनली इन इंडिया ।

मैने सुना था कि आबादी के उम्र के लिहाज से भारत एक युवा देश है । देश की साठ फीसदी आबादी जवान कहलाने लायक है । हां उम्र के पैमाने पर सही है । पर दिमागी तौर पर सब के सब मौत का इंतजार करती हुई एक बेचारी भीड़ से ज्यादा कुछ नहीं है । मामला चाहे कोई भी हो । कोई लहर पैदा नहीं होती । संसद में पैसे लेकर सरकार गिराने की बात हो । बंगलुरु या अहमदाबाद में बम Žलॉस्ट की बात हो । सड़क खराब हो जाने की बात हो । या सरेशाम किसी युवति की इज्जत के साथ होने वाले खिलवाड़ की बात हो । हम पर कोई असर नहीं पड़ता । जब तक हम सुरक्षित हैं । हमें परवाह ही नहीं । आखिर हम जवान जो ठहरे ! इंडिया इज यंग ! ! ! !

जानता हूं अभी भी यकिन नहीं आता होगा । मान ही नहीं सकते । विश्व गुरू रह चुके हैं हम । ऐसे कैसे मान लेंगे । मैंने कहा और मान लें । अरे मैं कौन हूं । एक छोटा प्रयोग करके देखीए । देश और दुनिया में जुड़ी बातों पर लोगों के विचार सुनिए । खाट पर पड़े चर चर करने वाले बुढ़ापा राग और निंदा रस में डूबी व्या�याओं के अलावा कुछ और नहीं दिखेगा । एक भी आदमी ऐसा नहीं दिखता या बोलता कि हम नया क्या कर सकते हैं। पता नहीं क्यों उम्र से जवान लोग भी जवानी की भाषा भूल गए हैंं ।

हर मोड़ पर । हर चेहरे पर एक लाचारी दिखती है । बस यूं ही घीसटते रहने की लाचारी । कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं है । यही नहीं कोई आगे बढ़े तो एक दो नहीं चालीस लोग उसे रोकने को आगे आ जाते हैं । मां-बाप रोकते हैं । भाई बहन लगाम लगा देतेे हैं । दोस्त समाज सब जुट जाते हैं । अरे रोको इसे । यह पागल है जवानी की बात करता है । अरे कुछ नहीं होगा । बहुत आए और बहुत गए ।

बसों में सफर करते वक्त आस पास लोगों के चेहरे देखीएगा । एक बेचारगी सी दिखेगी । सबके चेहरे पर सम भाव बेचारगी । साथ साथ लटके रहने का भाव । उ�मीद बस दो ही है । किसी तरह पास वाली सीट पर बैठने का अवसर मिल जाए । या जल्दी बस स्टॉप आ जाए ।

बूढ़ा मुल्क और सोच भी क्या सकता है । मजेदार बात यह है कि लोग तर्क खोज लेते हैं । तर्क के रंग से बाल काले करने का प्रयास करते हैं । कहते हैं कि देखों जिंदगी ऐसे ही चलती है भाई । देखो बाल काले हैं हमारे । जवानी बची है यार । थोथे तर्क । पर कमजोर हाथों में भारी तलवार कितनी देर टिकती है । खुद ही सर या पांव पर दे मारते हैं हम सारे ।

अपने एक बुढ़ाते दोस्त के छोटे भाई की कहानी सुनाऊं आपको । जिंदगी और मौत के बारे में अधिकार भाव से बोलते नजर आते हैं । नौकरी जो करते हैं उसकी फिक्र कम है । जज्बा नहीं पेट भरने का रूटीन है । बेहतर तरीके से कैसे काम करते हैं यह पूछते ही चुप हो जाते हैं । पर जिंदगी और मौत पर चर्चा छेड़ीए कि उनका व्या�यान शुरू हो जाता है । मेरी एक महिला मित्र हैं। हां, वाकई हैं । उनकी छोटी बहन भी है । एक दिन शुरू हो गइंü । जिंदगी और जिंदगी के बाद की जिंदगी पर । उनकी रूचि देखकर मैं भी दंग रह गया । पूछा, जिंदगी को कौन सी दिशा देना चाहती है । बोलीं , होय वही जो राम रची राखा। अब ऐसे लोगों से हम जवानी की उ�मीद क्या करें । होय वहीं , जो राम रची राखा। हां अधूरा छोड़कर लिखना बंद कर रहा हूं । बाकी जल्द ही । किस्तों में । यहीं ।

Friday, July 4, 2008

खबरों की डुगडुगी

खबरों की डुगडुगी
खबरिया जगत में कई कैरेक्‍टर होते हैं. खबरों को लेकर उनकी सोच एक खास किस्‍म की होती है.कई बार इन बडे लोगों का व्‍यक्तिव का असर उनके संस्‍थान पर भी दिखने लगाता है. यहां पेश की जा रही कहानी मीडिया की नई सोच रखने वाले एक ऐसे ही संपादक की कहानी है.जो खबरों को एक खास नजर से देखता है. एक संपादक के अलावा वह एक मालिक का नौकर भी है. जिसका काम अखबार बेचना और अपनी टीम के लोगों की नौकरी बचाए रखना भी है.तो लीजिए पेश है खबरों को तय करने की प्रक्रिया से जुडी एक कहानी वह भी बिलकुल नए अंदाज में. यहां यह बताना जरूरी है कि यह कोई व्‍यक्तिगत कहानी नहीं है और ना ही इस कहानी से मीडिया जगत में किसी को कुछ संदेश देने की कोशिश है.यह घटनाक्रम को एक अलग नजर से देखने की कोशिश मात्र है पसंद आए तो बताइएगा जरूर
शुक्रिया
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खबरों की डुगडुगी
समय सुबह 10:25 बजे स्‍थान एक बडा अखबार का भव्‍य कार्यालय, बाहर से बेहद आलीशान दिखने वाले इस आफि‍स के तीसरे माले पर मीटिंग रूम तेजी से खुलते और बंद होते दरवाजों से अखबार के विभिन्‍न्‍ा एडिशनों में काम करने वाले बडे और नामी गिरामी संपादक पहुंच रहे हैंसबके हाथों में फाइल, कंधे पर लैपटाप, चेहरे पे तनाव और माथे पर पसीना झलक रहा हैअंदर आते ही हाय, हलो बोलकर सब जल्‍दी से लैपटॉप ऑन करने में जुटे हैं कोने में बैठा एक यूनीट का स्‍थानीय संपादक शांत है और सबकी हरकतों को गौर से देख रहा है
10:30 पर उन तमाम संपादकों का से भी बडा संपादक कक्ष में दाखिल होता है
तेज नजरों से वह सबकी ओर देख कर आंखों से ही बैठ जाने का ईशारा करता है
(यहां यह बताना जरूरी है कि इस म‍ीडिया संस्‍थान में इस बडे संपादक की तूती बोलती है, अखबार में उसकी मर्जी के बगैर कुछ नहीं छपता, एक आदमी भी इधर से उधर नहीं किया जा सकता, मीडिया जगत में अनोखी हरकतों के कारण यह संपादक बेहद चर्चित व्‍यक्ति रहा है, उसे पारंपरिक अंदाज में काम करने की आदत नहीं है,कभी तेज बोलता,अट़टाहास करता,तो कभी तमाम संपादकों को हिंदी की मशहूर और सर्वसुलभ गालियों से भी नवाजता......)
बहरहाल वापस वहीं लौटते हैा
बिग बॉस को आया देख पहल सब खडे हो गए और बाद बैठ गए . कुछ अभी भी रूमाल से चेहरा पोछते रहे थे
तभी .. .
बैठते ही बडा संपादक चिल्‍लाया
क्‍या अखबार निकाला है.?
ऐसे भला कहीं काम होता है क्‍या. !!!!
आखिर कब सुधरेंगे आप लोग !!!!
सन्‍नाटा सा पसर गया एकाएक
सब शांत हो गए.
कुछ की घिघगी बन गई,,,
तभी
बडे वाला संपादक हसा.......
हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा !!!!!@@@@!!!!!!!
बाकी संपादक चोरी से एक दूसरे की शक्‍ल देखने लगे @@@@@
हा हा हा हा हा हंसी लगातार तेज होती जा रही थी
जमूरे..
जमूरेएएएएए.....
जमूरेएएएएएएएएएए......
सब समझे और सब एक साथ चिल्‍लाए
उस्‍ततााााााााााााााद .....
क्‍या खबर लाए हो संपादकों
बारी बारी से बताओ
लाल शर्ट वाले पडोसी राज्‍य के स्‍थानीय संपादक की ओर पहला इशारा हुआ
और ठाकुर क्‍या खबर है आज
उस्‍ताद
वह हमारे यहां आज सुबह सडक दुर्घटना हुई है .
चार लोगों की मौके पर ही मौत हो गई.
हमारे यहां आज मेन लीड इसे बना सकते हैं;
रिपोर्टर लगा दिए हैं. कई साइड स्‍टोरी भी होगी
अच्‍छा यह बताओ उनकी प्रोफाइल क्‍या है बडे वाले संपादक ने पूछा
जी सर मीडिल क्‍लास के हैं घर में एक ही कमाने वाला था वह भी दुर्घटना में मर गया
हमममम
यह क्‍या बकवास है बडे वाला चिल्‍ला उठा
कितने दिनों से कह रहा हूं हमें अपमार्केट खबर चाहिए
अखबार गरीब लोग नहीं पढते.....
ठाकुर साहब और यह जो लाल रंग का शर्ट आप पहन कर आएं है वह भी ......
वह फ‍िर चिल्‍लाया
और पंडत जी आपके इलाके का क्‍या हाल है क्‍या बेचेगो आप
उसने कहा कि हमारे यहां आज कुछ बडे नेता पहुंच रहे हैं प्रदर्शनी में भाग लेने आ रहे हैं
बडे वाले बिफर पडे
आप लोगों को समझते समझते उम्र गुजर जाएगी ...
यह अखबार है नेताओं के दलाली का अड़डा नहीं...
आप लोगों से कुछ नहीं होगा.... घर चले जाओ...
काशी में मकान बनवा लीजिए आप.....बुढापे का इंतजाम कीजिए...
बांयी हाथ की ओर गुलाबी शर्ट पहने स्‍थानीय यूनीट का संपादक अभी भी शांत था.
उसके चेहरे पर एक मुस्‍कान तैर रही थी..
कुछ कहने का मौका खोज रहे थे
बडे वाले ने ताड लिया
बोलिए मिसिर जी
जी सर बडी खबर यह है कि संबानी परिवार के मुखिया का प्‍यारा विदेशी कुत्‍ता मर गया है,
साहब विदेश दौरा कैंसल कर लौट रहे है
कोई पांच लाख का कुत्‍ता था, उसका अंतिम संस्‍कार होगा,
चैनलों पर यही लाइव चल रहा है
मेरे रिपोर्टर भी वहां उनके बंगले के बाहर तैनात हैं
अपमार्केट जगत से आज इस पर खूब चर्चा हो रही है
हम्‍मम
मुस्‍कुराए
पठनीयता है इसमें
बेची जा सकती है यह खबर
और संबानी साहब की ओर से हमें हर साल करोडों का विज्ञापन मिलता है इसे लीड बनाया जाए
.....
कुछ देर बाद बैठक समाप्‍त हो जाती है
.....
------------
उधर टेलीविजन चैनलों पर कुत्‍ते के मौत को लेकर हाय तौब मची हुई थी
कुछ "शोक में संबानी" तो कुछ चैनल "संबानी का साहब" जैसे कैच वर्ड के साथ खबर चला रहे थे
तेज चैनल पर उस कुत्‍ते और संबानी साहब की पुरानी तस्‍वीर को एक्‍सक्‍लूसीव बनाकर दिखाया जा रहा था
वहीं खुद को गंभीर खबरों के लिए मशहूर चैनल पर कुछ पशु विशेषज्ञों से बातचीत की जा रह रही थी
एक तीसरे चैनल पर मशहूर फ‍िल्‍मी हस्तियों के पालतू कुत्‍तों से प्रेम की खबर प्रसारित हो रही थी
जबकि एक और चैनल दुनिया के कुत्‍तो और उस खास कुत्‍ते के ब्रीड पर खबर दिखा रहा था
इस बीच
एक चैनल पर ब्रेकिंग न्‍यूज दिखी
"संबानी भारत पहुंचे "
मुंबई एयरपोर्ट से उतरते संबानी का फुटेज दिखाया गया
आधे स्‍क्रीन पर उस कुत्‍ते के साथ खेलने में जुटे संबानी साहब के पुराने विजुअल फाइल शिर्षक से दिखाए जा रहे थे
संवाददाता की आवाज गूंजी
" संबानी साहब भारत पहुंच गए हैं . जैसा की आप जानते हैं कि अपने पालतू कुत्‍ते
और घर के सबसे अहम सदस्‍यों में शामिल "शान" की मौत पर संबानी परिवार को
गहरा धक्‍का लगा है .... शान की मौत की खबर को सुनकर
संबानी ने सारे कामकाज छोड भारत लौटने का फैसला लिया.....
..एयरपोर्ट से सीधे वह अपने घर जाएंगे ...परिवार वालों से मिलेंगे ...
और कुत्‍ते को अंतिम विदा देंगे
आईए हम जानते हैं खुद संबानी साहब से कि उन्‍हें कैसा लग रहा है
" संबानी साहब शान के जाने के बाद आप कैसा महसूस कर रहे हैं ? "
"संबानी साहब" "संबानी साहब" "संबानी सा हब" "संबानी सा ह ब"
भीड में उस संवाददाता की आवाज गुम हो गई
टीवी एंकर सतर्क हो बोला लगता है "संपर्क टूट गया है" हम वापस लौटेंगे हमारे संवाददाता के पास जो एयरपोर्ट पर मौजूद है
------------
दूसरे चैनल पर ब्रेकिंग न्‍यूज थी
संबानी अपने बंगले पहुंचे
यहां घर के अंदर का दश्‍य दिखाया जा रहा था
शान के शव सफेद चादर में लिपटा था
परिवार के सदस्‍य आंखों पर काला चश्‍मा लगाए मौजूद थे
संवाददात की आवाज विजुअल के साथ
स्‍क्रीन पर एक्‍सक्‍लूसीव बोल्‍ड और लाल अक्षरों में
"जैसा की आप देख सकते हैं यहां खामोशी है. पूरा परिवार सदमें है. संबानी परिवार के लोग उसे घर का सदस्‍य मानते थे"
इस बीच बडी काली गाडी में सवार संबानी साहब वहां पहुंचे
संवाददाता शांत हो चुका था, टीवी एंकर बोलना शुरू कर चुका था,
"जैसा की आप देख सकते है संबानी साहब वहां पहुंच चुके हैं"
यह पोर्टिको में गाडी से उतरते हुए संबानी साहब,,
सामने उनके भाई राहत संबानी दिख रहे हैं,
साथ में हल्‍के हरे सूट पहने हुए उनकी पत्‍नी भी वहां मौजूद है
संबानी को कैमरा फॉलो कर रहा है
शान के पास जाकर वह उसके सर को छूते हैं
अभी वक्‍त हो चला है एक ब्रेक का ..
ब्रेक के बाद जारी रहेगा संबानी की कहानी. हम बताना चाहेंगे की संबानी साहब के घर के अंदर
केवल हमारा चैनल ही पहुंच पाया है...
म्‍यूजीक...पर्दे पर "सदमें में संबानी" दिखता है ....
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अरे मिसिर जी यह बातएं कि
यह कुत्‍ते की केस हिस्‍टी क्‍या है
गुलाबी शर्ट वाले संपादक बडे वाले संपादक के कमरे में बैठ कर चाय पी रहे थे
सामने टीवी एक विशाल स्‍क्रीन पर चार चैनलों पर खबर चल रही थी
हालांकि आवाज एक ही आ रही थी
मध्‍यम आवाज करीब करीब फुस्‍फुसाहट सी
सर वह यह कुत्‍ता कभी
ब्रिटेन राजमहल में रहता था
अच्‍छा
जी एलिजाबेथ की सबसे प्‍यारी कुतिया इसकी बहन है
ओह
हां और अब तक यह चैनल वाले पता हीं नहीं कर पाएं है
हा हा हा
एलिजाबेथ की कुतिया की बहन हम्‍म्‍म्‍म , हम जो सोच रहे हैं उससे भी बडा मामला हो सकता है
आप नए जमाने की खबरों को खूब समझते हैं म‍िसिर जी
यही वजह है आपको हमने लोकल यूनीट का इंचार्ज बना रखा है
वैसे मालिक भी आपके काम से खुश है
वो आपने ...
जी जी समझ गया
सर तो मैं चलूं
हां मिसिर जी
शाम तक कोई और घटना नहीं घटी तो यही बडी खबर बन सकती है
वैसे एक बात बताएं
यह गुलाबी शर्ट कहां से लिया,किते का है
सर वो यू ही....
चेहरे पर मुस्‍कान और बॉस का विश्‍वास कंधों पर लिए मिसिर जी चेंबर के बाहर हो लिए
उधर चैनलों पर जूतमपैजार की नौबत आ चुकी थी
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बडे बास के चेंबर से संपादक जी को निकलता देख
स्‍थानीय ब्‍यूरो के रिपोर्टर सतर्क हो गए थे
वह सीधे रिपोर्टरों के पास पहुंचे
और कहा कि संबानी का कुत्‍ता कोई मामूली कुत्‍ता नहीं है
वह आज की सबसे बडी खबर है
मुझे हर पहलू पर खबर चाहिए
कब आया, कहां से आया, भारत में हर साल कितने कुत्‍ते विदेशों से मंगाए जाते हैं
खरीदता कौन है कैसे पालते हैं विदेशी और भारतीय मालिकों में बेहतर कौन है पैकेज चाहिए सब पर
याद रखों सात बजे तक सारी खबर मेरे पास होनी चाहिए,,,
वहां संबानी के बंगले पर कौन गया है
सर वो सुमन गई है
सुमन उस लडकी को क्‍यों भेज दिया
सर उसने पहले भी कुत्‍तों पर कई स्‍टोरी की है
इसलिए भेज दिया
वैसे एक रिपोर्टर स्‍टॉक बाजार भेजे
दूसरे को पेट शॉप पर भेजों देखों आज पेट क्‍लीनिक में आने वाले कुत्‍तों की संख्‍या रोजाना से कितने फीसदी ज्‍यादा रही
जी सर
और हां
शाम सात बजे तक सारी खबरें मिल जाएं
सब रिपोर्टर रवाना हो गए
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साला संपादक जी सठीया गए है
अब हम कुत्‍तों की खबर करेंगे और क्‍या
पता नहीं अखबार का क्‍या होगा
यह मालिक की आंखें बंद क्‍यों हो गई है
साला चुतिया बना रहे है उसे लोग
इसे दिखता नहीं क्‍या
बाहर निकले रिपोर्टर कुछ ऐसे ही बात कर रहे थे
आओ गौरव
सिगरेट पीते हैं
अब आप ही बताइए गौरव क्‍या करें
कुछ नहीं यार शांत हो जाओ सौरभ मेरे भाई
यह दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी
हम यहां काम करने आए है
सौरभ ने हामी जातई
हां हलवाईं हैं हम...जैसा कहोगे वैसा ही खाना बनाएंगे.
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उधर चैनलों पर कुत्‍ते से जुडी बाते बताई जा रही थी
अचानक जानवर विशेषज्ञों की कमी सी हो गई थी
सो रिपोर्टर और एंकर सुबह की रटी रटाई बातों को दोहरा रहे थे
आपका कुत्‍ता हमारा कुत्‍ता संबानी का कुत्‍ता हर ओर कुत्‍ते दिखाई पड रहे थे
विज्ञापनों में भी कई कुत्‍ते अचानक से उभर कर बाहर आने लगे थे
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शाम पांच बजे का वक्‍त हो चला होगा
सूरज की रोशनी हल्‍की होना शुरू हो गई थी
हर की एक गली में दो बच्‍चे मजाक कर रहे थे अरे यार
तेरी शक्‍ल तो शान से मिलती है वे
अरे साला ऐसी किस्‍मत मेरी कहां
संबानी का कुत्‍ता है साला
मर गया तो देश जान गया
बेटा
टीवी में दिखा रहे हैं सारे चैनल वाले
एसी कमरा था उसका
दो नौकर थे तुम्‍हारे जैसे
रेड मीट नहीं खाता था
संबानी जब भी भारत में होते उसे खुद ही खाना खिलाते थे
झूठ दिखाते है
तीसरा दोस्‍त जबरन उनकी बहस में शामिल हुआ
बोला साले कोई भी समझदार आदमी के पास बीबी को खाना खिलाने का वक्‍त नहीं होता
वह क्‍या कुत्‍ते को खिलाता होगा ,,, यह साले चैनल वाले भी हमें चुतिया बना रहे हैं
झूठे साले
हा यार बाकी दोनों सहमती में सर उठाते हैं
गौरव इन तीनों की बात सुन रहा था
तभी मोबाइल पर उसकी गर्ल फ्रेंड का फोन आया
कहां हो
कुते के पीछे
कुत्‍ते के पीछे कौन तुम या तुम्‍हारे पीछे कुत्‍ता पडा है सही से बताओ यार

( आगे जारी रहेगा...)

Thursday, March 6, 2008

शुक्रिया बाला साहब

सबसे पहले बहुत शुक्रिया आपका बाला साहब ठाकरे।
राज ठाकरे जी का भी धन्‍यवाद .
साथ ही आभारी हूं महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना का ।
इन लोगों के बहुत एहसान हैं।
खासकर हम बिहारियों पर
दरअसल पहले मैं बिहारी हुआ करता था।
ठोस खालिस देसी बिहारी.
बगैर किसी विशेषण या क्रिया विशेषण के।
भदेस बिहारी। एकदम ठेठ।
वैसे आज कल मुझे उत्तर-भारतीय भी माना जाने लगा है।
हिन्दी भाषी उत्तर भारतीय।
बहुत दिन नहीं हुए जब मेरे प्रांत से आने वाले तमाम भाईयों को पूरे देश से अलग समझा जाता था। उन्हें अलग एवं ख़ास विशेषणों से नवाज़ा जाता था,पर आज कल माहौल थोड़ा बदल गया है। ठेठ और भदेस समझे जाने वाले हम वतन भाई बन्धु इन दिनों अपने प्रमोशन का ख़ूब मज़ा भी ले रहे हैं। अब चुँकि ज़माना ग्‍लोबलाइज़ेशन का है सो किसी प्रकार हम बिहारियों का थोड़ा प्रमोशन और हो जाता तो बेहतर होता हम भी पूरे तौर पर भारतीय बन जाते।

बाला साहब की बड़ी मेहरबानी है कि उन्‍होंने यूपी वालों और समस्‍त हिंदी भाषा बोलने वालों को एक ही तराजू से तौल दिया। वरना हम बि‍हारियों को तो अब तक यूपीवाले भी उत्तर-भारतीय मानने से इंकार कर रहे थे। अब जब बाला साहब ने बात छेड़ ही दी है तो दिल में कुछ और ख्‍वाहिशें जवाँ होने लगी हैं


काश ! बाला साहब ठाकरे बुश की जगह अमेरिका के राष्‍ट्रपति होते और तब गरीब गंदे बिहारियों और तमाम दूसरे साफ सुथरे भारतीयों को एक साथ गरियाते। तब हम सच्‍चे अर्थों में भारतीय हो जाते. पूरा भारत ग़रीब हिन्दीभाषी होने के जुर्म में एक साथ खड़ा होता

हे बाला साहब ! आप ओबामा का रूप क्‍यों नहीं धारण कर अमेरिकी चुनाव को एन्टी बिहारी ऊप्स एन्टी इन्डियन का मुद्दा उछाल कर चुनाव अभियान को नई दिशा देते। वैसे अगर आप ओबामा या हिलेरी को अपना आशीर्वाद दे दें तो हो सकता है कि वह भी आपका काम कर देते । काश कि वह हम बिहारियों को तमाम भारतीय लोगों के साथ बुरा भला कहते।
और हम सब बिहारी यूपीवासी,गुजराती,मराठी जैसे छोटे विशेषणों से ऊपर उठ भारतीय बन जाते।

बाला साहब के लिये भी एक बड़ी खबर है

सुना है कि बिहार के झुमरी तलैया में तालाब के बीच में बाला साहब का एक मन्दिर बनवाया जा रहा है,ख़ास बात यह है कि मन्दिर में जाने के लिये उत्तर दिशा से एक भव्य प्रवेश-द्वार बनवाया जा रहा है जिस पर उत्तर भारतीय प्रवेश द्वार अंकित कराया जायेगा,मन्दिर में मराठियों का प्रवेश पर रोक होगी। केवल बाला साहब ही उनके इकलौते प्रतिनिधि के रूप में वहाँ मौजूद होंगे।

वैसे उत्‍तर-भारतीय होने की बात ही जुदा है,कुछ ख़ास है एक अजीब एहसास है।

बुधवार को मैंने अपने एक यूपी वाले भाईसाहब को फोन किया
घंटी जाने पर
जब उन्‍होंने पूछा कौन बोल रहा है?
मैंने कहा उत्तर-भारतीय बोल रहा हूँ साहब,
हिंदी भाषी भी हूँ ...
उन्‍होंने तुरंत अफसोस जताया और कहा
हां यार कल तक बाला साहब बिहारियों को बुरा-भला कह रहे थे
अब उन्‍होंने उत्तर-भारतीय को भी जोड़ लिया है
अब हमें मिलकर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए.
हम मीडिया में है और चुप बैठे हैं बताओ क्‍या किया जाना चाहिए....

बताना जरूरी समझता हूं कि कुछ समय पहले जब असम में बिहारियों को मारा जा रहा था
बेचारों को वहां से भगाया जा रहा था
तब इन्‍हीं सज्जन ने मुझे फोन किया था
और कहा था बिहारी लोग बहुत गंदगी फैलाते हैं
उन्‍हें तो दिल्‍ली से भी भगा देना चाहिए.

बाद में जब रेलवे की नौकरी के लिए
बिहारी बेरोजगार महाराष्‍ट्र पहुंचे और वहां उनकी पिटाई हुई तो
एक दिल्‍लीवासी पंजाबी भाईसाहब से फोन पर बातचीत हुई थी
इसी मसले पर भाईसाहब ने
अफसोस जातते हुए कहा था कि
यार एक बात बोलूँ, बुरा मत मानना पर तुम लोग इसी के लायक हो
बुधवार सुबह
टीवी पर बाला साहब का बयान आने के बाद शाम को को
मैंने
इन्‍हीं पंजाबी भाईसाहब को फोन लगाया था
और कहा कि भाईसाहब मैं उत्तर-भारतीय बोल रहा हूं
मैं अब बिहारी नहीं रहा
उन्‍होंने कहा कि समझा नहीं
मैंने कहा
सर बाला साहब और ठाकरे परिवार की बड़ी मेहरबानी है
आजकल सभी हिंदी भाषी उत्तर-भारतीय बन गए हैं ,
कोई बिहारी, यूपी का भईया नहीं रहा
पता नहीं क्‍यूं
वह कुछ बोल नहीं पाए ...
सॉरी यार
बोल के फोन रख दिया...
बाद में
फोन ही नहीं उठाया उन्‍होंने ।

बताते चलें कि नोएडा के कॉल सेंटर ने ग़ज़ब का काम किया है
यूपी बिहारी और मुस्लिमों को नौकरी देने से इंकार कर दिया।
नेटएंबीट कंपनी और उनकी एचआर कंसल्‍टेंसी कनेक्‍ट ग्‍लोबल रिक्रूटमेंट का दिल से शु्क्रिया

बहुत दया है साब !
उन्‍होंने एक बार फ़िर‍ हम लोगों को साथ रख दिया है

मेरा मानना है कि इन सभी संस्‍थानों और संगठनों को देश में एकता और समरूपता के प्रहरी होने का पुरस्‍कार दिया जाना चाहिए.
............
जाते-जाते
बाला साहब का लेटेस्‍ट बयान पर एक हमवतन हिंदीभाषी उत्तर -भारतीय भाई का जबाब आया है..
बयान था
पहले बिहार में महात्‍मा बुद्ध,महावीर,चाणक्‍य पैदा होते थे इन दिनों लालू,पप्‍पू और चप्‍पू जैसे लोग पैदा हो रहे हैं
जवाब आया है
हमें अफसोस है कि बाला साहब और राज ठाकरे जैसे लोग यहां पैदा नहीं हो पाए......
……
शुक्रिया उत्तर-भारतीयों।
ठाकरे परिवार को ख़ास तौर से धन्यवाद।
बुरा लगे तो बिहारी समझ कर गाली दे देना।वैसे अब आप मुझे उत्तर भारतीय भी कह सकते हैं।

Tuesday, October 30, 2007

शायद यही है सच

शायद यही है सच

एक दूसरे के लिए

कुछ पाने और सब खोने

की तमन्‍ना

शायद यही सच है

एक दिन

सब रिश्‍ते

ऐसे ही

रूक जाते है

जैसे

पानी कहीं

बहता

रूका पडा हो

किसी झील में

शायद यही सच है

शायद ....

Monday, October 29, 2007

रात जब

रात जब

दफ़तर से लौट रहा था

मेरे साथ मेरा गम भी था

उसने पूछा

दफ़तर से घर जाते वक्‍त

मुझसे कुछ सवाल

तन्‍हाईयो से भरे

उदास करता गया

तब सामने से एक रोशनी आई

देखा

जिंदगी सडक पर लोट रही थी