Sunday, July 27, 2008
जिन्दगी न जाने किस मोड़ पर ले आयी है,
जिन्दगी न जाने किस मोड़ पर ले आयी है,
अब तो अपने भी बेगाने से लगने लगे हैं...
मन मन्दिर में बिठाकर जिन्हें पूजा था मैंने,
उन्हें इस बात का अहसास तक नहीं कि मुझ पर क्या बीत रही होगी.....
दिल का करार न जाने कहां खो गया है,
लेकिन एक वो है कि उन्हें अब लौटना गवारा नहीं....
एक छोटा सा सफ़र दर्द का सैलाब बन जाएगा,
मुझे इस बात का एहसास नहीं था.....
उनका ख़्याल आते ही जहन में पुरानी यादें एक बार फिर से ताज़ा हो जाती हैं,
समय के साथ उनमें भी फर्क आ गया है....
पहले यादों के साथ चेहरा खिल उठता था,
आज वही यादें नश्तर चुभने का काम करने लगी हैं....
तनहा जीना मुमकिन सा लगने लगा है,
अब तो ऐसा लगने लगा है कि उनकी याद में मेरे जीवन कि डोर टूटती जा रही है........
Thursday, July 3, 2008
इंतज़ार
विकसन भाई लगातार लिख रहे हैं । लगता है कभी ख़ुद खबर लिखने वाले इस सज्जन की कविताओं पर खबर या आलेख लिखने का समय करीब आ गया है। हमारी शुभ कामनाएं आपके साथ हैं। पेश है उनकी एक और रचना खास गुलज़ारबाग पर ।
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ऐसी चोट खाई है दिल पर कि अब तो,
दर्द का अहसास भी जाने लगा है..
तुम्हारा इंतज़ार करना मेरी आदत हो गई है,
पर दिल यह बात मानने को तैयार ही नहीं है..
कि शायद तुम अब कभी नहीं आओगे,
तुम्हारे आने के इंतज़ार में जैसे-तैसे दिन तो कट जाता है..
पर शाम होते ही हसरतें एक बार फिर से अंगड़ाई लेने लगती हैं,
रात इतनी लम्बी व तनहा होती है..
कि उसे करवट लेकर काटना भी मुश्किल हो जाता है,
दिल ने भी अब जवाब देना बंद कर दिया है..
शायद उसे भी नहीं पता,
कि में कौन सा रिश्ता निभाने के लिए
यह सारी ज़द्दोज़हद कर रहा हूं..