Showing posts with label चंद एह्सास..मान्या.... Show all posts
Showing posts with label चंद एह्सास..मान्या.... Show all posts

Friday, August 3, 2007

तुम भी लम्हा बुनो ना....


एक लम्हा है..

प्यार का..

हौले से छू..

लो ना...

कब से..सूना है...

लम्हा.. अकेला सा...

सरगम..होठों पर..

सजने दो ना...

रूठ गया है..

वो लम्हा...

अल्ह्ड़ सा...

तुम जरा...

मना लो ना..

बहुत याद आता है..

वो भीगा लम्हा..

तुम ख्वाब में..

बुला लो ना...

गिरा है..

वक्त की शाख से..

एक लम्हा फ़िर..

तुम किताब में...

रख लो ना..

सर्द रात में..

ठिठुरता है लम्हा..

तुम बांहों में...

ले लो ना....

बरसता है...

बादल सा लम्हा..

तुम भी संग...

भीग लो ना...

वो उदास सा...

बैठा है लम्हा...

तुम कोसा सा...

बोसा ले लो ना..

वो उड़ चला लम्हा..

फ़िर बंजारा सा..

आओ तुम भी..

जरा संग चलो ना..






Friday, July 13, 2007

उसकी खामोशी जाने क्या कहती है..







वो जो खोई-खोई... चुप-चुप सी रहती है....



उसकी खामोशी भी जाने क्या कहती है....



बन्द लबों में चुप सी उदासी...



झुकी नज़रों में भरी नमी सी...



फ़िर भी मुस्कान बिखेरा करती है....



उसकी खामोशी भी जाने क्या कहती है...






हर पल मशरूफ़ वो कुछ उलझी सी....



हाथों से झुकी लटों को पीछे करती....



जाने क्या सोचा करती है....



उसकी जुल्फ़ें भी परेशान रहा करती हैं.....



उसकी खामोशी भी जाने क्या कहती है....






जाने कहां देखती रहती है गुम सी....



खुले आंचल में लगती बड़ी भली सी...



खुद से भी अनजानी लगती....



उसकी उंगलियां दुपट्टे से खेला करती है...



उसकी खामोशी भी जाने क्या कहती है......






शांत, गहरी, साफ़ आंखें..बिल्कुल आईने सी....



देखती है मुझको...लगती है मुझमें शामिल सी...



पर फ़िर भी एक दूरी सी रहती....



उसकी निगाहें भी सवाल किया करती हैं...



उसकी खामोशी भी जाने क्या कहती है....

Saturday, July 7, 2007

यूं ही सही.....







एक पल को ही सही पर.... कोई तो कहने को अपना हो...



भूला सा ही सही पर.... होठों पर कोई तो नगमा हो...



झूठा ही सही पर... आंखों में कोई तो सपना हो...



शिकवा ही सही पर... तुम्हें मुझसे कुछ तो कहना हो...



छोटा ही सही पर... जीने को कोई तो लम्हा हो....



दर्द ही सही पर.... दिल को कुछ तो सहना हो...



गम ही सही पर.... मुझे तुमसे कुछ तो मिलना हो...



अंधेरा सा ही सही पर.... घर में मेरा भी तो एक कोना हो...



अनजाना ही सही पर.... मेरा तुमसे कोई तो रिश्ता हो...



Tuesday, July 3, 2007

मैं बस एक गुजरता लम्हा हूं


"क्यूं इतने सवाल करते हो मुझसे... इतने प्रश्नचिन्ह किसलिये????..... तुम भी जानते हो और मैं भी... कोई रिश्ता नहीं तुम्हारे मेरे बीच.... ना हम साथी ना ही हमसफ़र...ये बस एक राह्गुजर जहां हम मिले अचानक यूं ही.... मैं ना तुम्हारे कल में शामिल थी..... ना आने वाला कल मुझसे जुड़ा है..... मैं बस अभी हूं... यहीं केवल इस पल में शामिल हूं.... मैं खुशी हूं चंद लम्हे लाई हूं... प्यार के... मुस्कान के.. साथ हूं कुछ दूर का बस.... आई हूं अपनी मुस्कान तुम्हारे होठों पर सजाने... कुछ लम्हों के फ़ूल जिंदगी में खिलाने... देखो मेरी निगाहों से दुनिया को... सजने दो पलकों में फ़िर सपने नये.... तुम किस कशमकश में हो... कैसी उलझन... ये कैसा अविश्वास मेरे होने पर.... मैं एक गुजरता लम्हा हूं...गुजर जाउंगी बहते वक्त के साथ... एक लहर हूं आई हूं और लौट भी जाउंगी... मन की सूखी मिट्टी को भिगोने दो मुझे.... होने दो गीला-गीला मन.....गुनगुना लो इस भीगे नग्मे को .. अपने सूखे होठों पर..कर लो साथ जिंदगी के लम्हों में.... शामिल नहीं हो सकती तुममें... ना होना चाहती हूं... मैं बस एक एहसास हूं .... मह्सूस करो.... क्यूं बांध रखा है खुद को... कैसा डर खुशी से, रंगों से.... मैं आई हूं रंग भरने... जिंदगी की तस्वीर में... कल जब चली जाउंगी... दे जाउंगी ये तस्वीरें .. कुछ यादें.. गीला मन.... खिली मुस्कान.. चंद गीत....ना कभी थी ना कभी रहूंगी.... चाहा कुछ नहीं.... बस लौटाने आई हूं तुम्हारे ख्वाब...विश्वास...सरगम...तुम्हारी जिंदगी....अब और सवाल मत करो... यकीन करो इस गुजरते लम्हे का.... खोने दो मुझे .. तुम खुद को पा लो... देखो बीतता जाता है वक्त.... और गुजरना है मुझे भी...."