Friday, May 18, 2007

मै यहीं हूं सदा से


मै यहीं हूं सदा से

मैं यहीं हूं सदा से। कहीं और जाने का सवाल भी नहीं है। किसी के लिये मैं एक सराय हूं। किसी के लिये दो वक्त कि रोटी जुटाने की जगह तो किसी के लिये पूजा और इबादत स्थल। कभी रस्ता तो कभी मंजिल। ना मालूम मेरे कितने रूप हैं। मेरे दामन में हजारों फूल खिले कई जख्म भी मिले। मगर मैं रहा। वक्त के हर पल का हिसाब दर्ज करता रहा। आज सदियों बाद कोई इन्हीं भुले बिसरे पन्नों को संजोने कि कोशिश कर रहा है। फ़र्क केवल इतना है कि वहां गुलज़ारबाग एक जगह का नाम था। यहां विचारों के इसी सैरगाह का।

शुक्रिया।

5 comments:

Monika (Manya) said...

गुलजारबाग इस जगह से इतना तो नही जुड़ी हूं .. पर स्म्रुतियां हैं.. जैन मंदिर.. रेलवे स्टेशन.. कुछ दोस्तों के घर.. और यहां का इतिहास..कई बार गई हूं.. कई रूप हैं सच कहते हो..
कहते हैं जरूरी है इंसान का जड़ों से.. जुड़ा होना.. और लगता है तुम अपनी जड़ों से गहरे जुड़े हो...और जहां जड़ें होती हैं वहां सिर्फ़ सत्य होता है .. जीवन का.. क्योंकि अगर जड़ ही खोखली हो जायेगी.. तो निर्माण कहां से होगा..
उम्मीद है तुम्हारी इस सैरगाह में लोग आयेंगे.. सिर्फ़ सैर को नहीं .. बल्कि रुकेंगे, सोचने को मजबूर होंगे.. ताज़ादम होकर फ़िर आगे बढेंगे..
गुलज़ारबाग फ़िर से गुल्ज़ार होगा यहां पर.. मेरी शुभकामनायें साथ हैं और हमेशा रहेंगी..

Anonymous said...

aur kya hal hai aapke, apne bhi blog shru kar diya,

regards

Monika (Manya) said...

sahi lag raha hai boss.. par sirf aise changes se kaam nahi chalega,.. baat kane ko maahaul hi nahi topic bhi chaahiye.. kuchh likho naa..waiting..

Anonymous said...

अभय जी,
आपका ब्लौग देखा,आपकी रचनात्मकता भी देखी,सरस है,आपका पुर कशिश अन्दाज़े बय़ांदिल को छू गया,बस शब्द नहीं हैं अन्यथा बहुत कुछ लिखता,अब वाकई हम खुले माहौल में बातें कर सकते हैं

nivedita said...

Manya ji and Abhay ji aap dono ke blog humne dekhe. aap dono ki rachnaye padhe kar bahut achchha laga.ummid hai ki aap dono issi tarah hamesha likhte rahe or hum padhte rahe.

with regards
nivedita