Sunday, September 23, 2007

आपके साथ

मैं आप के साथ रहना चाहती हूँ
मैं आप के साथ जीना चाहती हूँ
हाथों मे हाथ डाल खिलखिलाना चाहती हूँ
कंधे पर सिर रख रोना चाहती हूँ
मैं आपको पाना चाहती हूँ
मैं आपके साथ जीना चाहती हूँ

बिन आपके नही जी पाऊँगी
निर्जीव हो जाउंगी मैं
कैसे रह पाऊँगी मैं
भला प्राण के भी कोई साँस ले पता है
बिना आत्मा के शारीर रह पाता है
तो फिर कैसे सोच लिया तुमने
रह लुंगी मैं तुम बिन
मेरा प्यार हो तुम
रक्त संचार हो तुम
मेरी हिम्मत हो तुम
मेरा हाथ पकड़ आगे बढ़ने कि सीख देते हो तुम
मेरा दामन थाम चलते रहना तुम
जब तक साँस रहेगी मैं आप के साथ रहूंगी ।

6 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

सहज-सुन्दर रचना।

*** राजीव रंजन प्रसाद

M VERMA said...

भला प्राण के भी कोई साँस ले पता है
बिना आत्मा के शारीर रह पाता है
बेहतरीन रचना सार्थक सवाल
आत्मा और शरीर तो पूरक है

RAJNISH PARIHAR said...

सही कहा आपने ,किसी के साथ रहने से ही उसको बेहतर समझा जा सकता है..

RAJNISH PARIHAR said...

सही कहा आपने ,किसी के साथ रहने से ही उसको बेहतर समझा जा सकता है..

शरद कोकास said...

रचना तो अच्छी है लेकिन पुरुष पर इतनी निर्भरता ठीक नहीं ।

Udan Tashtari said...

सुन्दर समर्पित भाव!

मेरा दामन थाम चलते रहना तुम
जब तक साँस रहेगी मैं आप के साथ रहूंगी ।