Friday, June 8, 2007

...हम भी थोडा ग़ुलज़ार करेँ..........



इस बाग को,हम भी थोडा ग़ुलज़ार करॅ
दिल मे जो अरमाँ हैँ, उन पर कुछ ऐतबार करेँ.....
माना कि हम मिल न सकेँगे कभी
तो आओ कुछ पल यहीं विश्राम करेँ,
और चिराग जला कर,थोडा इंतज़ार करेँ,
दिल के कुछ सौगात इस गुल पे निसार करेँ!

याद है मुझे अब भी, उनसे पहली बार मिलना
भूला नहीं हूँ आज भी, सपनों का बिखरना
पर संभाले रहा खुद को बस इस आस में
रात के बाद सुबह है, बस यही इंतज़ार में!

तो आओ, फिर एक भोर के लिये
इस रात का भी सम्मान करें,
आओ इस बाग को हम भी थोडा ग़ुलज़ार करें
दिल मे जो अरमाँ हैँ, उन पर कुछ ऐतबार करें................

--------------------dimagless

2 comments:

Monika (Manya) said...

बहुत सही लिखा है.. उम्दा.. कुछ पल यहीं विश्राम करें.. इस बाग को हम भी थोड़ा गुल्ज़ार करें.. बिना दिमाग के ही. ऐसी बातें की जा सकती हैं..

dimagless said...

bilkul sahi kaha..dimag se to hum sirf artificial hi ho gayee hai.thora bahut agar dimag nahi use kare to shayad apne liyee,zindagi se kuch pal chura bhi leen.thanx